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लोक राज संगठन का बयान, 2 जुलाई, 2002

सर्वोच्च न्यायालय ने कांग्रेस के पूर्व सांसद, दिवंगत श्री एहसान जाफरी की विधवा, श्रीमती जकिया जाफरी द्वारा दायर एक याचिका को ख़ारिज़ कर दिया है। 2002 में, गोधरा में ट्रेन को आग लगने के बाद हुई भयानक हिंसा के दौरान एहसान जाफरी की हत्या की गई थी। याचिका में विशेष जांच दल (एस.आई.टी.) की समापन रिपोर्ट को चुनौती दी गई थी, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ, तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी या किसी अन्य सरकारी अधिकारी के, उन हिंसक घटनाओं के लिए किसी भी रूप से ज़िम्मेदार होने का कोई सबूत नहीं मिला था। सर्वोच्च न्यायालय ने एक तरफ एस.आई..टी के सदस्यों के प्रयासों की सराहना की। “हम एस.आई.टी. के अधिकारियों की टीम द्वारा उन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों, जिनका उन्हें सामना करना पड़ा था, में किए गए अथक कार्य के लिए अपनी प्रशंसा व्यक्त करते हैं।” दूसरी ओर, सर्वोच्च न्यायालय ने उन लोगों के प्रयासों की निंदा की जो श्रीमती जाफरी के साथ खड़े थे। “वास्तव में, प्रक्रिया के इस तरह के दुरुपयोग में शामिल सभी लोगों को कटघरे में खड़ा कर देना चाहिए और उन पर क़ानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए”। देश और दुनियाभर में प्रतिष्ठित क़ानूनी विद्वानों और ज़मीर वाले पुरुषों और महिलाओं ने न्यायपालिका द्वारा, इस भारी न्यायिक अतिक्रमण पर बहुत आश्चर्य व्यक्त किया है।

सुप्रीम कोर्ट के इस बयान के 24 घंटों के भीतर, गुजरात पुलिस के “आतंकवाद विरोधी दस्ते” (ए.टी.एस.) ने मानव अधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार, सुश्री तीस्ता सीतलवाड़ और भूतपूर्व उच्च पुलिस अधिकारी, श्री आर.बी. श्रीकुमार को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें श्रीमती जाफरी को ऐसी याचिका दायर करने के लिए उकसाने की साज़िश में शामिल होने के आरोप पर और श्रीमती जाफरी के दुःख व अपने मारे गए पति के लिए इन्साफ पाने की तीव्र इच्छा का तथाकथित दुरुपयोग करने के आरोप पर गिरफ्तार किया गया।

बीस साल पहले, फरवरी 2002 के अंत में, अहमदाबाद और गुजरात के अन्य शहरों व ग्रामीण जिलों में हजारों निर्दोष लोग मारे गए थे, सैकड़ों महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और कई अपंग हो गए थे। उन भयावह घटनाओं ने पूरे देश के लोगों की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था।

प्रसिद्ध न्यायविद, दिवंगत श्री वी.आर. कृष्ण अय्यर की अध्यक्षता में, चिंतित नागरिकों के न्यायाधिकरण (कंसंर्ड सिटिज़न्स ट्रिब्यूनल) ने उन घटनाओं के बाद अहमदाबाद और गुजरात के अन्य स्थानों में व्यापक जन सुनवाई की। न्यायाधिकरण में न्यायमूर्ति होसबेट सुरेश (लोक राज संगठन के पूर्व अध्यक्ष), न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत और श्री के.जी. कन्नबीरन जैसे कई जाने-माने लोग भी शामिल थे। उन्होंने नरसंहार के पीड़ितों के साथ-साथ विभिन्न कार्यकर्ताओं, पुलिस अधिकारियों और राजनेताओं की भी गवाही दर्ज़ की।

संकलित साक्ष्यों और सूचनाओं से पता चला कि नरसंहार की तैयारी महीनों पहले से शुरू हो गई थी। इससे पता चला कि यह एक स्वतः स्फूर्त “दंगा” नहीं था, जैसा कि सरकार बताती रही है। यह गुजरात के प्रशासनिक और पुलिस तंत्र के पूर्ण समर्थन से किया गया एक सुनियोजित और संगठित, जनसमूह के खि़लाफ़ अपराध था।

इसके अलावा, अनेक ज़मीर वाले पुरुषों और महिलाओं ने नरसंहार के पीड़ित परिवारों के लिए राहत शिविरों का आयोजन किया था। कुछ, जैसे सुश्री तीस्ता सीतलवाड़, ने नरसंहार को आयोजित करने वाले अपराधियों को सज़ा दिलाने के लिए क़ानूनी लड़ाई भी लड़ी। नरसंहार को आयोजित करने वाले अपराधियों को सज़ा सुनिश्चित करने के लिए तीस्ता सीतलवाड़ ने दो दशकों तक लड़ाई लड़ी है, चाहे अपराधी कितने भी उच्च पद पर क्यों न हों। 1984 में सिखों के नरसंहार जैसी पिछली भयावह घटनाओं ने स्पष्ट रूप से दिखाया है कि जब सरकार और सत्ताधारी ताकतें खुद ही सामूहिक हत्याओं और आतंक को आयोजित करने और फ़ैलाने में शामिल होती हैं, तब पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद नहीं होती है। सरकार, पुलिस और अन्य जांच एजेंसियां, न्यायपालिका और शासक वर्ग की राजनीतिक पार्टियाँ – सब मिलकर सच्चाई पर पर्दा डालती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि नरसंहार के आयोजकों को कभी भी सज़ा न दी जाये। पीड़ितों को न्याय दिलाने  की बजाय, और ज्यादा प्रताड़ित किया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने तीस्ता सीतलवाड़ और अन्य लोगों को, गुजरात सरकार के उन मंत्रियों और अधिकारियों के नाम पर तथाकथित कलंक लगाने के लिए सज़ा देने का आह्वान किया है, जिन्होंने “2002 में नरसंहार को रोकने के लिए कड़ी मेहनत की थी”।

क्या इसका मतलब यह है कि जो लोग सरकारी मशीनरी और सत्ताधारी ताक़तों द्वारा आयोजित किए गए आतंकवाद का विरोध करने और उसे बेनकाब करने की हिम्मत करते हैं, उन्हीं को निशाना बनाया जाएगा और सताया जाएगा? सुप्रीम कोर्ट ने बड़े आक्रमक रूप से, याचिकाकर्ताओं और उनके समर्थकों के बारे में कहा, “अपनाई गयी दुष्ट रणनीति का खुलासा करने के काम में लगे हुए हरेक अधिकारी की ईमानदारी पर सवाल उठाने की उन्होंने ज़ुर्रत की है; अवश्य ही ग़लत इरादों के साथ, स्थिति को उबाल पर रखने के लिए (एस.आई.टी. के ज्ञानी अधिवक्ता के अपने शब्दों में)” ।

उपरोक्त घटनाएं कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाती है जिन्हें स्पष्ट करने की आवश्यकता है। हमारे देश में उपनिवेशवाद के काल से ही, सांप्रदायिक हिंसा के कई कांड हुए हैं। उपनिवेशवाद के काल में यह स्पष्ट था कि ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने नफ़रत और सांप्रदायिक हिंसा फैलाने वाले संगठनों का समर्थन किया था। 1947 के बाद भी, सत्तारूढ़ सरकारों ने उपनिवेशवादियों द्वारा शुरू की गई ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का इस्तेमाल किया है। साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं को “स्वतरूस्फूर्त दंगों” के रूप में पेश किया जाता है, जबकि उन्हें बहुत ही सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया जाता है। ऐसे मामलों में, सरकार न केवल पीड़ितों की रक्षा करने के अपने फ़र्ज़ का त्याग करती है बल्कि, जैसा कि 1984 में सिखों के नरसंहार के मामले में स्पष्ट हुआ था, पुलिस और “कानून-प्रवर्तन” एजेंसियों की नरसंहार को अंजाम देने में सक्रिय रूप से मिलीभगत होती है ।

सुप्रीम कोर्ट यह कह सकता था कि उसके सामने पेश किए गए सबूतों या तर्कों के आधार पर, एस.आई.टी. की जांच की वैधता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। परन्तु जिन लोगों ने तरह-तरह के साधनों से याचिकाकर्ता का समर्थन किया है, उनके चरित्र पर इस प्रकार का आरोप लगाना – यह बेहद न्यायिक अतिक्रमण है। इसलिए यह समझ लेना चाहिए कि हमें यह संदेश भेजा जा रहा है, कि किसी को भी राज्य के किसी भी अंग के किसी भी नतीजे को चुनौती नहीं देनी चाहिए, चाहे वह पुलिस और सुरक्षा बल हो, या निचली अदालतें, या किसी ख़ास मक़सद के लिए गठित कोई अन्य निकाय।

इससे ज्यादा, और भी चौंकाने वाली बात यह है कि गुजरात पुलिस और गुजरात के तथाकथित आतंकवाद-रोधी दस्ते (ए.टी.एस.) ने, सुप्रीम कोर्ट द्वारा मात्र शक प्रकट करने (भले ही कोई सबूत नहीं है) के आधार पर, श्रीमती जाफरी के करीब के दो लोगों को, उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किये बिना, हिरासत में लेने की इतनी तत्परता दर्शायी। जाना गया है कि सुश्री सीतलवाड़ को पुलिसकर्मियों द्वारा अभद्र व्यवहार के कारण, कुछ चोटें भी आईं। उनके घरों पर छापा मारा गया है और साजिश के सबूत के लिए उनकी संपत्तियों की तलाशी ली जा रही है।

जैसे-जैसे लोगों और शासकों के बीच अंतर्विरोध बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे आज शासकों के सभी संस्थानों का जन-विरोधी चरित्र स्पष्ट होता जा रहा है। नागरिक अधिकारों और न्याय के रक्षकों पर यह वर्तमान हमला इस कभी न खत्म होने वाली कहानी का एक और अध्याय है। श्रीमती जाफरी द्वारा दायर याचिका के ख़ारिज़ होने को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

लोक राज संगठन सुश्री सीतलवाड़ और श्रीकुमार की तत्काल रिहाई की मांग को लेकर, सभी न्यायप्रिय लोगों और संगठनों के साथ शामिल होता है। हमारे देश में मानवाधिकारों की रक्षा के संघर्ष के हिस्से बतौर, नरसंहार के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए एकजुट होना और लड़ाई जारी रखना अत्यंत ज़रूरी है।

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