राजकीय दमन के विरुद्ध आवाज़ उठी!

31 अक्तूबर 2020 को विभिन्न संगठनों ने एकजुट होकर सिख जनसंहार की 36वीं बरसी पर नई दिल्ली स्थिति जंतर-मंतर पर जनसभा आयोजित की।

“एक पर हमला, सब पर हमला!”, “राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और बंटवारे की राजनीति के खिलाफ़ संघर्ष करें”, “राजकीय दमन नहीं चलेगा!” – एक बड़े और मुख्य बैनर पर लिखे हुए इन नारों में सभा में भाग लेने वालों की भावनाओं का समावेश था।

“बांटो और राज करो की राजनीति मुर्दाबाद!”, “राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंकवाद को एकजुट होकर खत्म करें!”, “राजकीय आतंकवाद मुर्दाबाद!”, “हिन्दोस्तानी राज्य सांप्रदायिक है, लोग सांप्रदायिक नहीं!”, आदि जैसे नारे लिखे हुये बैनर, सभा स्थल के चारों तरफ दिख रहे थे।

इस कार्यक्रम के आयोजक घटक थे – लोक राज संगठन, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, लोक पक्ष, हिन्द नौजवान एकता सभा, सिटीजन्स फॉर डेमोक्रेसी, देसीय मक्कल सकती कच्ची, पुरोगामी महिला संगठन, मज़दूर एकता कमेटी, सिख फोरम तथा अन्य।

लोक राज संगठन व अन्य संगठन जो उस जनसंहार के पीड़ितों को इंसाफ दिलाने की मांग को लेकर संघर्ष करते आये हैं। वे मांग करते आये हैं और इसी आधार पर अपने संघर्ष को आगे बढ़ाते आये हैं कि भविष्य में धर्म विशेष के लोगों को निशाना बनाकर उनका कत्लेआम न किये जा सकें। उसके लिए जरूरी कानूनी व राजनीतिक प्रावधान लागू किये जायें।

जनसभा को संबोधित करने वालों में थे – लोक राज संगठन के अध्यक्ष श्री एस. राघवन, लोकपक्ष से कामरेड के.के. सिंह, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी से कामरेड बिरजू नायक, वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया से जनाब सिराज तालिब, इसके अलावा पत्रकार व भूतपूर्व विधायक श्री जरनैल सिंह, ऐमान रिज़वी। साथ ही साथ मंच पर मौजूद थे, मज़दूर एकता कमेटी से कामरेड संतोष कुमार, हिन्द नौजवान एकता सभा से कामरेड लोकेश कुमार और पुरोगामी महिला संगठन से पूनम आदि।

वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि 1984 का जनसंहार राज्य द्वारा सुनियोजित काण्ड था।

इस हत्याकांड में हुक्मरान पार्टी, मंत्री मंडल, सुरक्षा अधिकारी व अफसरशाही सभी शामिल थे। यह हुकूमत के सबसे उच्च स्तर पर आयोजित थी। 1984 का जनसंहार हुक्मरान वर्ग की “बांटो और राज करो” की रणनीति का हिस्सा है। हमारी राजनीतिक पार्टियों की यह पसंदीदा नीति है, जिसे लागू करके वे बड़े कॉर्पोरेट घरानों के हित में और लोगों के हितों के खिलाफ अपनी नीतियों को हमारे ऊपर थोप देते हैं। हुक्मरान और उनका राज्य यह झूठा प्रचार करते हैं कि लोग सांप्रदायिक हैं, यह बताते हुए, वक्ताओं ने तमाम उदाहरणों को देखकर बताया कि यह हिन्दोस्तानी राज्य ही है जो सांप्रदायिक जनसंहार आयोजित करता है। 1984 की घटनाओं से साफ देखने में आया कि राज्य के अधिकारी और सुरक्षा अधिकारी हत्याकांड के मूक दर्शक बने रहे और कातिलाना गुंडों की मदद भी करते रहे। जबकि लोगों ने बहादुरी के साथ आगे आकर, पीड़ितों को बचाया और उन्हें हर तरह की मदद दी।

कई वक्ताओं ने हाल ही में, पूर्वोत्तर दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि बिना राज्य की भूमिका के इस तरह के सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम संभव नहीं है। पुलिस कातिलों को नहीं पकड़ती है बल्कि न्याय के नाम पर उन्हीं लोगों का उत्पीड़न करती है, जो खुद इस सांप्रदायिक और कत्लेआम के शिकार या पीड़ित हैं।

वक्ताओं ने बताया कि हम भूले नहीं हैं कि 36 बरस पहले दिल्ली की सड़कों पर क्या गुजरा था। न ही, बाबरी मजिस्द विध्वंस और उसके बाद आयोजित किए दंगे, 2002 गुजरात कत्लेआम, मुज़फरनगर और अब पूर्वोत्तर दिल्ली में आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और दंगे। आज भी चारों तरफ नफरत भरे अपराध हो रहे हैं। मानव अधिकारों की हिफाजत करने वालों पर राज्य का भारी दमन हो रहा है। इन हालातों में यह बेहद जरूरी है कि हम बहादुरी के साथ आगे आकर जो भी गलत किया जा रहा है, उसका विरोध करें। “गुनहगारों को सज़ा दें!”, इस नारे का मतलब है कि सबसे पहले, उन राजनीतिक पार्टियों, मंत्रियों और उच्च अफसरों, यानि हिन्दोस्तानी राज्य के कमान के पदों पर बैठे उन सभी को सज़ा होनी चाहिए, जो जनसंहार को आयोजित करने और अंजाम देने के जिम्मेदार थे और जिन्होंने पीड़ितों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया था। 1984 के बाद पैदा हुयी नई पीढ़ी को यह सच्चाई बताना जरूरी है ताकि भविष्य में वैसा भयानक हत्याकांड फिर न हो सके।

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