भारतीय चुनावों में धन-शक्ति एक निर्णायक भूमिका निभाती है। 2019 के आम चुनावों में, दिल्ली के मीडिया अध्ययन केंद्र के अनुसार, अनुमानित खर्च लगभग 60,000 से 65,000 करोड़ रुपये है। इसका मतलब है कि औसतन 120 करोड़ रुपये हर एक लोकसभा सीट पर खर्च किए गए। यह पिछले आम चुनाव की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक होगा।

चुनाव दर चुनाव  धन-शक्ति का उपयोग बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है । हर चुनाव में, झुग्गी निवासियों, श्रमिकों, किसानों, महिलाओं, आदिवासियों आदि के अधिकारों के लिए लड़ रहे जनता के उम्मीदवारों के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। तथाकथित ‘लोकतंत्र’ मात्र ‘धनतंत्र’ बन कर रह गया है। जो उम्मीदवार लोकसभा में लोगों की आवाज़ उठाना चाहते हैं उनको  व्यापारिक घरानों और बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा निधिबद्ध राजनैतिक पार्टियों की धन-शक्ति को चुनौती देने में बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

2019 के चुनाव प्रचार में,  खासकर भाजपा और कांग्रेस द्वारा  सोशल मीडिया के उपयोग में  खासी वृद्धि देखी गयी। अकेले सोशल मीडिया पर 5,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है जबकि 2014 के चुनाव में यह केवल 250 करोड़ रुपये था। दोनों पक्षों द्वारा सोशल मीडिया पर अपने प्रचार प्रसार, झूठ, प्रतिवाद तथा एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए विशेष संगठन का गठन किया गया। इसके अलावा हजारों करोड़ रुपये, बीजेपी और कांग्रेस द्वारा टीवी तथा अखबारों के माध्यम से चुनाव प्रचार के लिए खर्च किए गए|

सभी बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों ने अप्रैल 2017 से मार्च 2018 के लिए सिर्फ 1300 करोड़ रुपये की संयुक्त आय की घोषणा की थी। यह समग्र अनुमानित खर्च का केवल एक छोटा सा हिस्सा है, शायद 2% ही!  फिर सोचने वाली बात है कि चुनाव खर्च का यह बड़ा हिस्सा कहां से आता है ?

 

चुनावी सुधारों की सिफारिश करने के लिए गठित विभिन्न समितियों ने चुनावों के फंडिंग में काले धन के प्रभुत्व के बारे में बहुत शोरगुल मचाया। उन्होंने बड़े जतन के साथ यह साबित करने की कोशिश की है कि यह बेईमान व्यापारियों, तस्करों, ड्रग पेडलर्स और गैंगस्टरों की अवैध कमाई से उत्पन्न धन था जो चुनावों में अधिकांश खर्च के लिए जिम्मेदार था। बिहार, यूपी और झारखंड के 2577 राजनेताओं के चुनावी व्यय का एक अध्ययन बताता है कि 44% खर्चों का हिसाब नहीं दिया गया अतः इसे काला धन मन जा सकता है।

सभी समस्याओं के पीछे काले धन के राक्षस को चित्रित करते हुए, छोटे उत्पादकों, श्रमिकों और किसानों की अजीविका को भयावह लागत पर एनडीए सरकार ने नोटबंदी लागू की। यदि सरकार काले धन पर अंकुश लगाने में कामयाब रही है तो इस तथ्य को कैसे  नज़रअंदाज़ किया जा सकता है कि 2014 के चुनावों की तुलना में इस चुनाव में 40% अधिक धन खर्च किया जाएगा?

यहां तक कि चुनाव आयोग के सतर्कता दस्ते द्वारा किए गए धन की जब्ती का उद्देश्य चुनावी धन के वास्तविक  प्ररूप को छिपाना है। 26 मार्च और 15 अप्रैल 2019 के बीच, बरामदगी में 683 करोड़ रुपये नकद, 213 करोड़ रुपये की शराब, 1144 करोड़ रुपये की नशीली दवाएं मिलीं। इस बरामदगी का मूल्य निश्चित रूप से इस चुनाव में खर्च जाने वाले गए धन का तिनका मात्र है।

यह बहुत ही अद्भुत बात है कि चुनाव आयोग को नकदी के व्यापक उपयोग की समस्या देश के केवल एक निर्वाचन क्षेत्र तमिलनाडु के वेल्लोर में ही मिली जहां उसने भारी मात्रा में नकदी की ज़ब्ती के आधार पर चुनाव रद्द कर दिया !

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के अनुसार, कॉर्पोरेट  क्षेत्र ने 2017 और 2018 के बीच राष्ट्रीय पार्टियों को 422 करोड़ रुपये दान के रूप में दिए। उनका यह अंशदान इन दलों द्वारा प्राप्त कुल दान का लगभग 90 प्रतिशत था। लेकिन वर्तमान चुनावों की कुल अनुमानित लागत की तुलना में, चुनावी बांड के माध्यम से प्राप्त कॉर्पोरेट दान सिर्फ एक तिनका मात्र  है।

चुनावी खर्च का बड़ा हिस्सा बड़े कॉर्पोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा वहन किया जाता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनकी हितकारी पार्टी जो यथास्थिति बनाये रखेगी सत्ता के लिए चुनी जाए, वे विभिन्न तरीकों से चुनाव अभियानों में धन का वितरण करते हैं। संपूर्ण इजारेदार-स्वामित्व मीडिया के  दोनों प्रिंट और टीवी अन्य सभी लोगों के उम्मीदवारों की उपेक्षा कर केवल इन्हीं दलों को प्रमुख स्थान देते हैं । यथा-स्थिति बरकरार रखने वाले दलों के प्रवक्ताओं को ही केवल टीवी टॉक शो में भाग लेने को मिलता है। कॉर्पोरेट घराने रैलियों, स्वयंसेवकों, पोस्टर, बैनर, हेलीकाप्टर की सवारी, और विभिन्न अन्य खर्चों के लिए धन उपलब्ध करवातें  हैं। उनके सलाहकार और चुनाव-विश्लेषक इन दलों को सलाह देते हैं कि मतदाताओं को उनके हित में मतदान करवाने के लिए कैसे भरमाया जाए।

चुनाव आयोग ने व्यक्तिगत उम्मीदवार के चुनावी व्यय को सीमित किया हुआ है जो कि लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवार के लिए  प्रतिनिधित्व-क्षेत्र के आधार पर 50 से 70 लाख रुपये के बीच में है । उम्मीदवारों द्वारा किये गए व्यक्तिगत खर्च की इस सीमा का कोई महत्त्व नहीं है क्योंकि किसी पार्टी या अन्य निजी निकायों को असीमित खर्च की छूट है। इस सुविचारित विसंगति का कॉर्पोरेट घरानों द्वारा समर्थित सभी दलों द्वारा पूरी तरह से उपयोग किया जाता है।

चुनावों में धन-शक्ति के वर्चस्व पर अंकुश डालने के लिए काफी सुधारों की घोषणा की गई जैसे कि उम्मीदवारों का सीमित व्यक्तिगत चुनावी-खर्च, चुनावी बॉन्ड, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत संपत्ति का खुलासा, काले धन पर अंकुश लगाने के उपाय, परन्तु यह सब सुधार कॉर्पोरेट घरानों द्वारा किये गए खर्च जो यह सुनिश्चित करने के लिए के लिए किया जाता है कि एक पार्टी जो उनके हितों की रक्षा  करती है सत्ता पर आसीन हो, यह उन जैसे प्रमुख मुद्दे को नहीं संबोधित करता है|

चुनावों में धन शक्ति का  प्रभुत्व और यथा-स्थिति बरक़रार रखने वाले दलों द्वारा राजनीतिक और चुनावी प्रक्रिया का वर्चस्व, सत्ताधारी वर्ग के उन दावों को खोखला साबित करता है कि विश्व ने लोकतांत्रिक चुनावों की प्रक्रिया इतने बड़े पैमाने पर कभी न देखी होगी ।

वर्तमान चुनावों में, कई लोक-संगठनों ने धन-शक्ति के प्रभुत्व की लड़ाई धरातल पर लड़ी है। उन्होंने कॉर्पोरेट-घरानों के धन के प्रवाह और मतदाताओं को रिश्वत देने का प्रयास के उजागर को किया है। उन्होंने चुनाव आयोग को पेशकश की है कि जो उम्मीदवार चुनावी नियमावली के अंतर्गत खर्च की सीमा का उल्लंघन करते हैं उन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। धन-शक्ति के खिलाफ मज़बूती से उठायी गयी आवाज के परिणाम स्वरुप वेल्लोर में चुनाव  रद्द किया गया था।

लोक राज संगठन ने निरन्तर मांग की है कि केवल एक लोक-केंद्रित राजनीतिक व चुनावी प्रक्रिया ही धन-शक्ति और सत्तारूढ़ वर्ग समर्थित दलों के प्रभुत्व को समाप्त कर सकती है। इसका मतलब यह है कि किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवारों का चयन उस निर्वाचन क्षेत्र की जनता द्वारा किया जाना चाहिए, उस क्षेत्र की जनता को निर्वाचित प्रतिनिधियों वापिस बुलाने का हक़ भी हो यदि निर्वाचित प्रतिनिधि उस क्षेत्र के हित में कार्य करने में असमर्थ रहा हो, जनता को कानून-निर्माण के सूत्रपात का अधिकार भी होना चाहिए और, अंत में चुनावी प्रक्रिया का निधीकरण राजकीय व्यवस्था द्वारा किया जाना चाहिए न कि किसी व्यक्ति विशेष या निकाय द्वारा। केवल राजनीतिक और चुनावी प्रक्रिया का पूर्ण बदलाव ही चुनावों में धन शक्ति के प्रभुत्व को हटा सकता है।

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