हिन्दोस्तान के नवीकरण के लिए कार्यक्रम :

लोगों को प्रभुसत्ता प्रदान करना ही उन्नति का एक मात्र मार्ग है

प्रस्तावना

1) हिन्दोस्तान को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है परन्तु हिन्दोस्तान के लोगों को हिन्दोस्तानी समाज की दिशा तय करने का अधिकार नहीं है। हिन्दोस्तान के अधिकांश लोगों को न तो रोजीरोटी व रोजगार की सुरक्षा है और न ही उनके पास ताकत है कि वे अपने दुःखदायी जीवन को बदल सकें। वे अपने देश में मनुष्य की तरह नहीं माने जाते। हिन्दोस्तानी लोगों का जाति, लिंग, धर्म और राष्ट्रीयता के आधार पर शोषण होता है।

2) हिन्दोस्तान के मजदूर और किसान जो अपना खूनपसीना एक करके समाज की दैनिक ज़रूरतों के लिए आवश्यक चीज़ों का उत्पादन करते हैं, उनके परिवार के सदस्यों के लिये पेट भर खाना भी सुनिश्चित नहीं है। करोड़ों मजदूर ऐसे हैं, जिनके सर पर न छत है न ही पीने का पानी। महिलाओं को मानव समाज में बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता और न ही उनकी आवश्यक जरूरतों की पूर्ति यह व्यवस्था करती है। दलितों को शोषणदमन का शिकार होना पड़ता है। धार्मिक तौर पर अल्पसंख्यक लोगों का दमन होता है और सांप्रदायिक हिंसा में वे अक्सर मारे जाते हैं। देश के विभिन्न राज्यों में आदिवासी लोगों को उनके पारंपरिक संपदा के स्रोतों से वंचित कर दिया गया है। उनका जन जीवन तहसनहस किया जा रहा है।

3) देश के उत्तरपूर्व और अन्य भागों में लोगों पर, जाति के नाम पर भेदभाव और राष्ट्रीयता के नाम पर दमन किया जाता है। कश्मीर, पंजाब और बंगाल राज्य के लोग जो 1947 के सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुये थे, वे अभी भी विभाजित हैं। देश के कई भागों में चल रहे जन आंदोलनों को हिन्दोस्तानी पुलिस और सेना द्वारा “नियमकानून कायम रखना” या “देश की एकता और अखंडता” के नाम पर बर्बर तरीके से कुचला जा रहा है।

4) संक्षिप्त में, इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने वाले देश में आम हिन्दोस्तानियों के साथ द्वितीय या तृतीय श्रेणी के नागरिकों की तरह व्यवहार किया जाता है। गौर करने की बात है कि हिन्दोस्तानी नागरिकों की यह हालत, देश के आज़ाद होने के 50 वर्षों के बाद भी है। वक्त का तकाज़ा है कि 100 करोड़ हिन्दोस्तानी अपने भाग्य की बागडोर अपने हाथों में लें, अपने देश की समस्याओं की जड़ तक पहुंचें और इस विशाल देश के सर्वांग नवीकरण का कार्यक्रम पूरा करें।

जनता को सत्ता से वंचित रखना समस्या की जड़ है

5) हिन्दोस्तान में वर्तमान लोकशाही व्यवस्था अधिकांश लोगों को राज्य सत्ता के दायरे से बाहर रखती है। समाज की अनगिनत समस्याओं का मूलभूत कारण यही है। हिन्दोस्तान में राजनीतिक सत्ता कुछ मुट्ठीभर लोगों के हाथों में केंद्रित है, जिसके बल पर वे अपने हाथों में समाज की आर्थिक संपत्ति और ताकत पर भी कब्जा कर सकते हैं और कर रहे हैं। इसका दुष्परिणाम यह है कि हिन्दोस्तान की आम जनता अपनी मूलभूत आवश्यकताओं और मानवीय अधिकारों और सम्मान से वंचित है।

6) फैसले लेने की सर्वोच्च ताकत, यानि प्रभुसत्ता जनता के हाथ में नहीं है यद्यपि हमारे संविधान का पहला वाक्य कहता है कि “हम हिन्दोस्तानी लोग स्वयं ही इस संविधान के निर्माता हैं।” जबकि वास्तविकता यह है कि समाज के भविष्य पर असर डालने वाले, मुख्य फैसलों को लेने में जनता की कोई भूमिका नहीं है।

7) समाज की दिशा तय करने वाले निर्णायक फैसलों को लेने और लागू करने का अधिकार कार्यकारी दल, यानि हुकूमत पार्टी या गठबंधन के मंत्रिमंडल के हाथ में है। वैधानिक ताकत, यानि कि संसद और विधान सभाओं का काम है कार्यकारी दल द्वारा लिये गए फैसलों को एक कानूनी और औचित्य का जामा पहनाना। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि कार्यकारी दल न तो वैधानिक दल के अधीन हैं और न ही संसद या विधान सभा में बैठे “निर्वाचित” प्रतिनिधि जनता के अधीन हैं या जनता के प्रति जबावदेह हैं। ये ”जनता के प्रतिनिधि“ केवल अपनी पार्टियों के हाई कमानों के प्रति जवाबदेह हैं और सदन या विधान सभा में जब वोट डालने का समय आता है अपनी पार्टियों द्वारा जारी किये आदेश का पालन करते हैं। न्यायाधिकारी दल कार्यकारी दल के द्वारा नियुक्त किया जाता है और वह किसी के प्रति जबाबदेह नहीं है।

8) मौजूदा राजनीतिक पार्टी व्यवस्था भी लोगों को राज्य सत्ता से वंचित रखती है। जो भी पार्टियां और पार्टी गठबंधन सदन या विधान सभाओं में अधिकांश विधायक, पार्षद या सांसद का बहुमत प्राप्त करने से सफल हो जाती है, वह फिर सरकार बनाती है और उसको मनमानी तरीके से राज करने का अधिकार मिल जाता है। चुनावी कानून और सरकार बनाने के कानून यह सुनिश्चित करते हैं कि हुक्मरानों की बड़ीबड़ी पार्टियां (जो इस वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को कायम रखने के लिए बनायी जाती हैं) ही निर्वाचन प्रक्रिया पर हावी रहती हैं। चुनावों के बाद सरकारें इन्हीं सत्ताधारी वर्ग की पार्टियों के गठबंधन होते हैं। सत्ता हड़पने के बाद ये पार्टियां उन सबसे शक्तिशाली आर्थिक वर्गों के निहित स्वार्थों की पूर्ती के लिये काम करती हैं, क्योंकि यही वर्ग तो इन पार्टियों को पैसे देते हैं, उन्हीं के सहयोग से ही यह पार्टियां चलती हैं। इस व्यवस्था के अंदर सरकार बनाने और चलाने में जनता की कोई भूमिका नहीं होती। इस प्रतिनिधित्व के लोकतंत्र के अंदर जनता की बस इतनी ही भूमिका है कि कुछ सालों के अंतराल पर वोट डालकर यह फैसला करे कि सत्ताधारी वर्ग की किस बड़ी पार्टी को हुकूमत चलाने का अधिकार मिलेगा, कौन सी पार्टी या पार्टी गठबंधन अगले कुछ सालों तक बड़ेबड़े अमीरों और उद्योगपतियों के हितों की हिफ़ाज़त करेगा।

9) हिन्दोस्तान की वर्तमान लोकशाही व्यवस्था 18वीं और 19वीं सदी के अंग्रेजी राजनीतिक सिद्धांतों की देन है। इस तरह की व्यवस्था का उद्देश्य इंग्लैंड के पूंजीपति वर्ग के हितों को बढ़ावा देना और उनकी सुरक्षा करना था। यह व्यवस्था आम जनता को सत्ता से वंचित रखने के लिए ही बनाई गई थी और सदियों से उसने इस उद्देश्य का बखूबी से पालन किया है। अंग्रेज (बर्तानवी) बस्तीवादी हुकूमत ने जब यह फैसला किया कि हिन्दोस्तान के कुछ पढ़ेलिखे, जायदाद वाले अमीरों को भी सत्ता चलाने में शामिल किया जाये तो उन्होंने अपने इस “प्रतिनिधित्व लोकशाही” को हिन्दोस्तान की धरती पर स्थापित किया। इसके तहत अंगे्रजी हुकूमत के प्रति वफादार लोगों के द्वारा चुनी गई प्रादेशिक विधान सभायें बनाई जाने लगीं जिसको अंगे्रजों ने लोकतंत्र का नाम दिया। यह प्रतिनिधित्व लोकशाही व्यवस्था हिन्दोस्तान में मौजूदा दमन करने की अंग्रेजों की प्रशासन व्यवस्था, (जिसमें उनके द्वारा स्थापित किये गए, कोर्ट, कचहरी, पुलिस और सेना जैसे दमन करने के साधन शामिल थे) के ढांचे को और सशक्त करने के लिये की गई एक और कुटनीति थी। गौर करने की बात है कि एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था जो हिन्दोस्तान की धरती पर हिन्दोस्तानी लोगों का शोषण, दमन, लूट करने के लिए एक विदेशी बस्तीवादी ताकत ने बनाई और परिपक्व की, उसी व्यवस्था को आज़ाद हिन्दोस्तान के सत्ताधारी वर्ग ने 1950 के संविधान के तहत हिन्दोस्तानी लोगों पर शासन करने के लिए एक उचित राजनीतिक व्यवस्था की मान्यता दे दी।

10) इस तरह से हिन्दोस्तानी लोकशाही व्यवस्था जो आज देश में लागू है उसी अंग्रेजी बस्तीवादी सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार हिन्दोस्तानी लोग इतने समर्थ नहीं हैं कि वे अपने समाज को चला सकें और इसलिए उन्हंे एक ऐसी ताकत की जरूरत है जो उन पर शासन करे। जाहिर है कि यह मूलभूत सिद्धांत किसी भी आत्मसम्मानी हिन्दोस्तानी नागरिक को न ही मान्य है, न ही यह सच है। वास्तव में हर एक हिन्दोस्तानी बहुत ही उत्सुकता और उत्साह से, कुशलता से इस देश की व्यवस्था को चला सकता है, और चलाने के लिए काबिल ही नहीं, उत्सुक भी है।

11) अधिकांश हिन्दोस्तानी लोगों के पास कुछ भी अधिकार नहीं है। हर एक हिन्दोस्तानी के लिए सभी मूलभूत अधिकारों की स्पष्ट परिभाषा और उसको सुनिश्चित करने के उपाय की जगह हिन्दोस्तान में एक बहुत ही जटिल विशेषाधिकारांें और भीख की तरह संरक्षण देने की प्रणाली स्थापित की गई है। 1950 का हिन्दोस्तानी संविधान हिन्दोस्तानी लोगों के लिए कोई भी अधिकार सुनिश्चित नहीं करता, न तो आत्मसम्मान से जीने के मानवीय हक, न ही लोकतांत्रिक अधिकार राष्ट्रीयताओं के अधिकार, महिलाओं के अधिकार, अल्पसंख्यकों के अधिकार। श्रम का अधिकार, इन सबको तो हिन्दोस्तान का संविधान मानता तक नहीं। संविधान में जो भी “मूलभूत अधिकार” हैं, उनका भी उल्लंघन किया जा सकता है, संविधान की ”विवेकसंगत सीमाओं“ के अनुच्छेद के अंर्तगत। इसीलिए हिन्दोस्तान में “आज़ाद हिन्दोस्तान“ की सरकार ने, संविधान की मदद लेकर, वैधानिक रुप से, अपने ही देश के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए, कई कानून बनाये हैं। जैसे कि तमाम काले कानून, जिसके द्वारा हिन्दोस्तानी सेना और अर्धसैनिक बल देश के कई भागों में हिन्दोस्तानी जनता को कुचलते हैं। दूसरी तरफ विडंबना यह है कि हिन्दोस्तानी नागरिकों को एक मानवीय सम्मान के साथ जीने की आवश्यकताओं, जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि को देश का संविधान ”मूलभूत हक़“ तक की मान्यता नहीं देता। इन सब आवश्यकताओं को संविधान में ”राज्य के नीति निर्देशक तत्व“ का दर्जा दिया गया है यानि कि, कागज पर लिखने के लिये ऊंचे आदर्श परंतु उनको सुनिश्चित करने के लिये न तो कोई कानून, न ही कोई साधन प्रणाली या उपाय। यह सब वास्तविकता में, राज्य सत्ता में बैठे लोग अपनी जवाबदारी व जिम्मेदारी तक नहीं समझते।

12) हालांकि संविधान में ”बराबरी“ और ”धर्म निरपेक्षता“ की बात की गई है परन्तु हर हिन्दोस्तानी नागरिक अभी भी उसकी जाति और धर्म के द्वारा ही पहचाना जाता है। ”अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने के लिये“ या ”कमजोर वर्ग के लोगों के संरक्षण“ के नाम पर आरक्षण की पद्धति लागू की गई, जो लोगों के खिलाफ़ ही जाती है। पिछले पचास सालों का लोगों का अनुभव यही दिखाता है कि इस तरह की नीतियों से न तो दलितों का उद्धार हुआ है, न ही उनका शोषणदमन कम हुआ है, न ही धर्म के आधार पर अल्पसख्ंयकों को संरक्षण मिला है। इस दोगली नीति से, इन सभी तबकों के ऊपर के कुछ गिनेचुने लोगों को इस व्यवस्था में एक विशेषाधिकार की तरह सत्ता में कुछ हिस्सा बतौर, इस व्यवस्था में एक स्थान मिला है। परन्तु इसके द्वारा बड़ीबड़ी सत्ताधारी पार्टियों की वोटबैंक की राजनीति को और बढ़ावा मिलता है, इस राजनीति से वे लोगों के संघर्षों को बांटने और गुमराह करने में सफल होते हैं। जाति, धर्म या और भी कारणों से जो शोषण और दमन चल रहा है उसके खिलाफ़ जन संघर्षों को सत्ताधारी वर्ग की पार्टियां आरक्षण और विशेषाधिकारों को राजनीति के द्वारा गुमराह करती हैं।

13) जहां तक राष्ट्रीयताओं की पहचान का प्रश्न है, हमारा संविधान उनको मान्यता तक नहीं देता, राष्ट्रीयताओं के अधिकार को लागू करने का सवाल ही नहीं उठता। हिन्दोस्तान जैसे प्राचीन सभ्यता वाले देश में विभिन्न राष्ट्रीयताओं, राष्ट्रों और आदिवासी लोगों के अधिकारांे का संरक्षण एक मूलभूत अधिकार है। जबकि मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ की परिभाषा केवल क्षेत्रीय सीमाओं पर आधारित है। अलगअलग प्रदेश और प्रांत, जो विदेशी हुकूमत ने अपनी लूट और शासन की सुविधा के लिये बनाये थे, हिन्दोस्तानी संविधान ने उसको हिन्दोस्तानी राष्ट्र की परिभाषा माना। और इस तरह से हिन्दोस्तानी प्रांतों और प्रदेशों को बदलने या नये प्रदेश बनाने और तोड़ने के सर्वोच्च अधिकार संविधान के अनुसार, हिन्दोस्तान की केंद्र सरकार के हाथ में है। इसीलिये हक़ीक़त यह है कि आज़ादी के पचास साल से भी ज्यादा समय के बाद हिन्दोस्तानी लोग अपनी राष्ट्रीयता, राष्ट्र, भाषा आदि के अधिकारों को हासिल करने लिये ज़िन्दगी और मौत का संघर्ष करने पर मजबूर हैं। देश में यह प्रश्न बहुत से तनावों और संघर्षों की जड़ है।

14) चूंकि हिन्दोस्तानी लोगों के अधिकारों और आकांक्षाओं का इतने समय से दमन ही होता आ रहा है और मौजूदा व्यवस्था में लोगों को अपनी समस्याओं को हल करने के लिये, अपनी परिस्थितियों को बदलने के लिये आवश्यक राजनीतिक सत्ता नहीं मिली है, इसलिये आज हिन्दोस्तान, लोगों और सत्ता के बीच संघर्ष का एक अखाड़ा बन गया है। हक़ीक़त यह है कि जब आम लोग अपनी ज़ायज़ मांगों को पेश करते हैं, उनको हासिल करने के लिये जन आंदोलन आयोजित करते हैं, तो बस्तीवादी अंग्रेजों की हुकूमत की तरह आज़ाद हिन्दोस्तान की सरकार इन संघर्षों को बेरहमी से सेना के द्वारा कुचलने की कोशिश करती है और संविधान इस लगातार दमन को एक संवैधानिक मान्यता देता है। इस संविधान के द्वारा ही और उसके अंतर्गत ही, चाहे कश्मीर हो, या उत्तरपूर्व के इलाके, वहां संघर्षरत हमारे देशवासियों के जायज राजनीतिक प्रश्नों का राजनीतिक हल ढूंढ़ने के बजाय, हिन्दोस्तानी सरकार उसको महज एक ”कायदाकानून कायम“ रखने का प्रश्न बताकर बेरहमी से फौज, पुलिस, कोर्ट, कचहरी, सभी उपकरणों द्वारा कुचलती है।

15) आज, जनता इस प्रकार की हुकूमत, इस तरह की राजनीतिक व्यवस्था से तंग आ चुकी है क्योंकि इसमें कुछ मुट्ठीभर खुदगर्ज़ ताक़तों को ही फ़ायदा होता है, उन्हीं के हितों की रक्षा होती है और आम लोगों का नुकसान। आज ऐसी व्यवस्था से, जो कुछ लोगों के हितों को आम जनता की आवश्यकताओं से ज्यादा महत्वपूर्ण मानती है, इस तरह की व्यवस्था से लोगों का भरोसा हट गया है। एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था, जो देश की प्राकृतिक और मानवीय संपत्ति को लूटने के लिये, अंग्रेज बस्तीवादी ताकतों के द्वारा बनाई गई थी, आज़ाद हिन्दोस्तान के नागरिकों की जरूरतों को पूरा करने के लिये उपयुक्त नहीं है। आज सभी हिन्दोस्तानी गुलामों की तरह, शोषितों की तरह नहीं रहना चाहते। वे अपने भाग्य विधाता स्वयं बनना चाहते हैं। उनकी आकांक्षाओं और अधिकारों की हिफ़ाज़त और पूर्ति के लिये एक नयी व्यवस्था की बहुत सख्त ज़रूरत नज़र आती है।

16) आज का हिन्दोस्तान दो वर्गों में, एक तरफ शासक वर्ग और दूसरी तरफ शोषित, दबीकुचली जनता, इन दो वर्गों में बंटा हुआ है। एक तरफ आम जनता, जिन पर सत्ता में बैठे लोग शासन करना चाहते हैं, इस शासन को और बर्दाश्त नहीं कर सकते, तो दूसरी तरफ हमारे हुक्मरान अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिये और भी गुनहगार तरीकों का सहारा लेने पर मजबूर हैं। अपनी हुकूमत के खिलाफ़ बढ़ते जनता के प्रतिरोध को कुचलने के लिये, साम्प्रदायिक हिंसा, राजकीय आतंक, और पोटा जैसे फाशीवादी कानूनों का इस्तेमाल और राजनीति के पूरी तरह से अपराधीकरण के बावजूद, शासक वर्ग मौजूदा हालातों पर काबू पाने में नाकामयाब रहा है। इस तरह की परिस्थितियों में, समय की मांग है, वक्त का तकाजा है कि लोगों को अपने अधिकार मिलें। लोगों को प्रभुसत्ता दिये बिना हिन्दोस्तानी समाज इस घोर संकट से बाहर नहीं निकल सकता। समाज की प्रगति के लिये लोगों के हाथ में प्रभुसत्ता का होना आज की एक राजनीतिक मांग ही नहीं, वह एक आवश्यक जरूरत भी है।

एक खतरनाक परिस्थिति से गुजरती हुई हिन्दोस्तानी जनता

17) अपने संकीर्ण और निहित स्वार्थसिद्धि के लिये हिन्दोस्तान के शासकों ने एक बहुत ही खतरनाक और जनविरोधी रास्ता अख्तियार किया है। इसके दोनों ही स्वरूप, यानि एक तरफ उदारीकरण और निजीकरण के द्वारा वैश्वीकरण का आर्थिक कार्यक्रम और दूसरी तरफ, अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ ”आतंकवाद के खिलाफ़ विश्वव्यापी युद्ध“ के नाम पर लोकविरोधी गठबंधन, ये दोनों देश के लिये बहुत ही अनिष्टकारी साबित होंगे।

18) आर्थिक सुधारों का कार्यक्रम जो अपने देश में इस समय लागू है, उसका आम लोगों की ज्वलंत समस्याओं के हल से कोई संबंध नहीं है। इसके विपरीत, इन आर्थिक सुधारों ने लोगों की रोजीरोटी और जिन्दगी को, चाहे गावों में या शहरों में, बहुत ही असुरक्षित बना दिया है। हिन्दोस्तानी सरकार जनता के पैसे से बनाये गये उत्पादन संसाधनों को निजी पूंजीपतियों को बेच रही है। सरकार को इस बात की परवाह नहीं है कि इन सुधारों और निजीकरण से लोगों की बड़े पैमाने पर तबाही हुई है। उसको केवल रुचि है कि किस तरह से जनता की पूंजी बड़ेबड़े औद्योगिक घरानों को कौड़ियों के मोल बेचकर उनका फायदा हो। उदाहरण के तौर पर, केन्द्र सरकार हिन्दोस्तान की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रही है। एक तरफ सार्वजनिक वितरण व्यवस्था नष्ट हो रही है, भारतीय खाद्य निगम के गोदाम भरे हैं और वह किसानों से और अनाज नहीं खरीदना चाहते, तो दूसरी तरफ हजारों लोग खाने के लिये दानेदाने को मोहताज हैं और भूख से दम तोड़ रहे हैं।

19) विश्व व्यापार संगठन की शर्तों को लागू करने के नाम पर सरकार ने देश का बाज़ार हर तरह की वस्तुओं के खुले आयात के लिए खोल दिया है। लाखों किसानों और छोटे उत्पादकों का जीवन तहसनहस हो रहा है। सस्ते दामों के इस आयात से लोगों के धंधे बंद हो रहे हैं और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, किसानों के बीच आत्महत्या की घटनाएं दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं।

20) विश्व में व्यापार के माध्यम से आम लोगों को परस्पर लाभ होना चाहिये। लोगों की जरूरतें पूरी होनी चाहिये। इसके लिये विश्व के स्तर पर एक विश्व व्यापार संगठन की तरह के संगठन की जरूरत है। परन्तु आज का विश्व व्यापार संगठन इस तरह का संगठन नहीं है जो आम लोगों के हितों की रक्षा करे, बल्कि वह साम्राज्यवादी शक्तियों, जिनमें अमरीका प्रमुख है, उनके हितों और उनकी इच्छा को दुनिया के लोगों पर थोपने का एक हथियार है। वह एक लोकतांत्रिक संगठन नहीं है जिसके द्वारा अलगअलग देशों और लोगों के हितों की रक्षा हो, उनके बीच परस्पर अंतर्विरोध को लोकहित में सुलझाया जाए। ऐसे संगठन में शामिल होकर हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने देश की प्रभुसत्ता का एक बहुत बड़ा हिस्सा गिरवी रख दिया है। उसकी शर्तों को मानकर, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी..) के समझौते पर हस्ताक्षर करके, उदाहरण के तौर पर, हिन्दोस्तान के लोगों ने यह अधिकार भी, कि देश में क्या आयात हो सकता है और क्या निर्यात करना चाहिये, खो दिया है। बड़ीबड़ी मुनाफाखोर कंपनियों (चाहे हिन्दोस्तानी या विदेशी) के मुनाफों को और बढ़ाने के लिये ही, दुनिया में उत्पादन और पूंजी का बडे़ पैमाने पर वैश्वीकरण किया जा रहा है। इस मुनाफे की हवस को मिटाने में, लोगों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। साम्राज्यवादी शक्तियों का नियंत्रण और विश्वव्यापी संगठनों जैसे डब्ल्यू.टी.., आई.एम.एफ., विश्व बैंक, द्वारा हिन्दोस्तान की आर्थिक व्यवस्था और जन जीवन में बाहरी विदेशी ताकतों की दखलंदाज़ी और बढ़ती जा रही है। साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा बनाये गये नुस्खे जो उनके हितों की हिफ़ाज़त करते हैं, उनको, हिन्दोस्तान की पार्टियां और पार्टी गठबंधन जो केंद्र या राज्य सत्ता में हैं, खुले तरीके से लागू कर रहे हैं, अपना रहे हैं। इससे लोगों की तबाही और भी बढ़ी है।

21) निजीकरण और उदारीकरण के द्वारा वैश्वीकरण का रास्ता लोगों के हितों की रक्षा के लिये नहीं बनाया गया है। इस कार्यक्रम का केवल एक मात्र उद्देश्य है कि बड़ीबड़ी इजारेदार कंपनियों और औद्योगिक एवं वित्तीय घरानों के मुनाफे कैसे बढ़ें और सभी अन्य हितों की पूरी तरह उपेक्षा की जा रही है। इस योजना में लोगों की जरूरतों को पूरा करने की आवश्यकता की कोई जगह ही नहीं है। “आज के बाज़ार द्वारा पे्ररित समाज में हर एक को अपनी रोजीरोटी का उपाय खुद ही करना होगा” यही सत्ता में बैठे लोगों का आम जनता के प्रति रवैया है। यह नुस्ख़ा या रास्ता जो लोगों पर थोपा जा रहा है, उससे लोग तबाह हो गये हैं। सामाजिक सम्पत्ति पर उनके जायज़ हक़ों को नकारा जा रहा है और इसलिये लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। गौर करने की बात यह है कि एक तरफ आम लोगों को बोला जा रहा है कि सरकार की उनके प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है, तो दूसरी तरफ बड़ीबड़ी इज़ारेदार कंपनियों, जैसे एनरान और ए..एस., बड़ेबड़े औद्योगिक घरानों, जैसे रिलाइंस, टाटा, बिरला, को सरकार अच्छे मुनाफों की गारंटी देती है। हिन्दोस्तानी राज्य बड़ेबड़े औद्योगिक और वित्तीय संस्थानों और कंपनियों के निश्चित मुनाफों की दर की गांरटी देने को इतना उत्सुक है, परन्तु करोड़ों लोगों की रोजीरोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, जैसे मूलभूत जरूरतों को पूर्ति करने की गारंटी लेने से मुंह मोड़ रहा है। “मुक्त बाजार” के प्रवर्तक यह दावा करते हैं कि बाजार में जाकर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, परन्तु बाज़ार में कोई बराबर नहीं, बड़ेबड़े खिलाड़ी बाज़ारों को कंट्रोल करते हैं। वास्तविकता तो यह है कि बड़ेबड़े मुट्ठीभर खिलाड़ी और अधिकांश छोटेछोटे उद्योगपति या धंधा करने वाले लोगों के बीच फासला और असमानता क्रमशः बढ़ती जा रही है।

22) जैसेजैसे हिन्दोस्तान और इस क्षेत्र के और देशों ने बड़ीबड़ी इज़ारेदार कंपनियों और साम्राज्यवादी शक्तियों को लूटने की खुली छूट दी है और आर्थिक सुधारों के द्वारा वैश्वीकरण का कार्यक्रम लागू किया है, वैसेवैसे इस पूरे दक्षिणी एशिया इलाके में साम्राज्यवादी शक्तियां, जिनमें अमरीका प्रमुख है, उनका प्रभुत्व, दखलंदाजी और इसके परिणाम स्वरूप पारस्परिक प्रतिस्पर्धा, अंतर्विरोध तथा युद्ध के खतरे बहुत बढ़ गये हैं। आर्थिक सुधारों के इस दौर का हिन्दोस्तान में बढ़ते हुये फौजीकरण और अमरीका के साथ हिन्दोस्तानी शासकों के राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक क्षेत्र में बढ़ते हुये सहयोग और लोकविरोधी गठबंधन से बहुत ही गहरा संबंध है। इस खतरनाक नीति को एक और बहाना मिला जब अमरीका ने “आतंकवाद के खिलाफ जंग” का ऐलान किया और हिन्दोस्तानी सरकार ने बहुत जोरशोर से उसकी सराहना की, उसकी पूरे दिलोजान से सहायता की।

23) “सितंबर को न्यूयार्क और वाशिंगटन में हुये आतंकवादी हमलों का इस्तेमाल करके अमरीका ने शीत युद्ध के बाद की बदलती दुनिया में, एशिया के भूखण्ड में अपना प्रभुत्व जमाने के लिये एक बहुत ही खतरनाक और कूटनीति वाली चाल चली। एशिया का दुनिया में एक महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि यह क्षेत्र प्राकृतिक और भौगोलिक दृष्टि से बहुत ही अहमियत रखता है। हालांकि राजनीतिक दृष्टि से यह काफी अस्थिर है। अमरीका की इस क्षेत्र में काफी समय से चली आ रही रुचि और इस पर कब्जा करने की ख्वाहिश चीन के साथ उसके संबंधों में हाल में तनाव बदलाव तथा दक्षिण एशिया पर उसकी नीति में से स्पष्ट दिखता है। इस योजना के अनुसार एक तरफ, अमरीकी राज्य हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है, खासतौर पर दोनों देशों की सेना और खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग, और दूसरी तरफ, हिन्दोस्तान और पाकिस्तान की सरकारों के बीच तनाव को और बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे अमरीका की इस इलाके में दखलंदाजी करने की गंुजाइश और बढ़ सके।

24) अमरीकी साम्राज्यवादियों के इस क्षेत्र में मंसूबों, साजिशों और विभिन्न तरीकों से अपना प्रभुत्व बढ़ाने की ख्वाहिशों को ध्यान में रखते हुये, हिन्दोस्तानी सरकार को बहुत ही सतर्कता और होशियारी से पेश आना चाहिये। उसके बजाय, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने अपने बहुत ही तंग नजरिये की सोच के अनुसार, अमरीकी महाशक्ति के साथ मिलकर पाकिस्तानी सरकार के साथ अपना हिसाबकिताब बराबर करने की तुच्छ योजना बनाई। वे समझते हैं कि वे अमरीका के कनिष्ठ सहयोगी बनकर, उसकी छत्रछाया में, इस क्षेत्र में और विश्व स्तर पर, अपना प्रभुत्व बढ़ाने में सफल हो जायेंगे। यह एक जोखिमभरी विदेश नीति है और हिन्दोस्तानी लोगों की शांतिप्रिय और साम्राज्यवादविरोधी भावनाओं और परंपराओं के विपरीत तथा उनके पीठ पीछे की गई साजिशों का एक हिस्सा है। जैसा कि स्पष्ट देखने में आता है, कि हिन्दोस्तानी सरकार के इस रवैये ने इस क्षेत्र में युद्ध का खतरा बढ़ा दिया है। हिन्दोस्तान तथा पाकिस्तान के लोगों को परस्पर भिड़ाया और दोनों के बीच भाईचारे की भावनाओं को भी ठेस पंहुचाई है। हिन्दोस्तानपाकिस्तान के बीच आपसी संबंधों के बिगड़ने से दोनों ही देशों के लोगों की प्रगति को धक्का पहुंचा है। इस क्षेत्र में शांति और परस्पर सहयोग की बहुत ही जरूरत है, यदि हम दोनों देश की उन्न्ाति की इच्छा रखते हैं। आज हक़ीक़त यह है कि हिन्दोस्तानी जनता एक बहुत ही खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। ऐसा लगता है कि उसे एक बड़े युद्ध का सामना करना पड़ सकता है जिस पर न ही कोई नियंत्रण होगा, न वह उनके हित में होगा और इस भूखण्ड के लोगों के लिये सर्वनाश और तबाही का कारण होगा।

औचित्य का संकट और परिवर्तन लाने का मौका

25) जो आज सत्ता में बैठे हैं, वे इस बात का दावा करते हैं कि उनको “जनादेश” हासिल है, उनको अमरीकी साम्राज्यवादियों से मिलकर इस क्षेत्र में सैन्यीकरण और युद्ध की साजिशें करने का, आर्थिक सुधारों का कार्यक्रम, जिसमें उदारीकरण और निजीकरण के द्वारा वैश्वीकरण का कार्यक्रम शामिल है, यह सब करने के लिये उन्हें लोगों का समर्थन प्राप्त है। परन्तु अपने दिनप्रतिदिन बढ़ते हुये असंतोष को लोग विभिन्न तरीकों से प्रकट कर रहे हैं। अधिकांश जनता इस तरह के कार्यक्रम के खिलाफ़ है। आम जनता का राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के द्वारा बताये गये झूठे वायदों और गुमराह करने वाले तर्कों पर भरोसा उठ रहा है। इस बढ़ते हुये असंतोष और निराशावादी रुख़ का ही नतीजा है कि चाहे केन्द्र हो या किसी राज्य में, किसी एक पार्टी का बहुमत हासिल करना या सरकार बनाना असंभव दिखाई देता है। इस तरह के माहौल में, जबकि सभी राजनीतिक पार्टियों पर लोगों का अविश्वास बढ़ता जा रहा है, सत्ताधारी पार्टियों ने अराजकता, हिंसा और जालिम तरीकों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। जैसे कि सत्ता में आने के लिये सांप्रदायिक दंगे आयोजित करना, राजकीय आतंक या निजी आतंक को बढ़ावा देना, बमविस्फोट और गुनहगारी संगठनों के द्वारा लोगों को गुमराह करना, बांट कर राज करने की साजिशें रचना, आदि। आम जनता इस हाल से बहुत ही दुःखी है, ऊब गई है। जनता कुछ निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये बनी राजनीतिक पार्टियों और उनकी गुटबाजी, भ्रष्टाचार, सरकारी खजाने की अंधाधुन लूट और आतंकवादी तरीकों से त्रस्त है। सभी को दिखता है कि केवल वोट देने का अधिकार काफी नहीं है। वोट के द्वारा केवल एक गुनहगारी और लोकविरोधी स्वार्थी पार्टी को हटाकर उसी तरह की दूसरी पार्टी को गद्दी पर बैठा दिया जाता है। हालात नहीं बदलते। लोगों को वोट के जरिये इन बिगड़ते हालातों को बदलने का अधिकार और उपाय नहीं मिलते। यही कारण है कि हिन्दोस्तानी लोकतंत्र आज अपने औचित्य के सबसे खतरनाक संकट को झेल रहा है।

26) परन्तु इस तरह का संकट, जिसमें सत्ता में बैठे लोग आम जनता का विश्वास खो बैठे हैं, और इस तरह की राजनीतिक व्यवस्था का लोगों के सामने पूरी तरह पर्दाफाश हो गया है, यह एक अवसर भी है कि हम एक नये तरीके से, एक नई दिशा और एक नयी व्यवस्था, एक नये विकल्प की रचना करें। हमें सोचना चाहिये कि हम ऐसा क्या करें कि जिससे समाज इस कुंठित, त्रिशंकु के हालातों से बाहर आ सके? हमें ऐसा कुछ करने की जरूरत है, जिससे आज जो सत्ताधारी वर्ग है, उसकी साजिशों, उसके मंसूबों, को हराया जा सके। कुछ मुट्ठीभर लोग जो केवल निहित स्वार्थों के लिये देश को इस खतरनाक रास्ते पर ले जा रहे हैं, उनको कैसे हराया जाये? लोक राज संगठन का कार्यक्रम इन्हीं ज्वलंत सवालों की व्याख्या, विश्लेषण, और अध्ययन का परिणाम है।

27) लोक राज संगठन के राजनीतिक कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य है कि प्रभुसत्ता, यानि फैसले लेने की सर्वाेच्च ताकत, लोगों के हाथ में आये, जहां कि उसे होनी चाहिये। जब लोगों के हाथ में राजनीतिक सत्ता होगी, तभी वे हिन्दोस्तानी समाज की दिशा तय कर सकेंगे एक ऐसी दिशा जिसमें समाज में बहुमुखी विकास हो और उनके हितों की पूर्ति हो। लोगों के हाथ प्रभुसत्ता हासिल करने की एक आवश्यक शर्त यह है कि वे उन वर्तमान राजनीतिक संस्थाओं और परंपराओं से नाता तोडे़ं, जो कि हमारे बस्तीवादी पश्चात की धरोहर हैं, एक नई शुरुआत करें। हिन्दोस्तान के लोकशाही नवीकरण का मतलब यही है। हिन्दोस्तान की आम जनता जो मौजूदा व्यवस्था के अन्दर सत्ताहीन है, बेबस है, वे सभी जो विकल्प की तलाश में हैं, इन्हीं लोगों को हिन्दोस्तान के नवीकरण का बीड़ा उठाना होगा।

28) नवीकरण का अर्थ है एक नई शुरुआत करना। जब तक समस्या की जड़ तक नहीं पहंुचा जाता, तब तक उसका समाधान असंभव है। मौजूदा राज्य और राजनीतिक प्रक्रिया का पुनर्निर्माण करना होगा, उनको एक नये सिरे से पुनःस्थापित करना होगा। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिये हमें न केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम चाहिये बल्कि सत्त प्रयास और प्रयत्न भी, जिससे हम इस तरह के साधन और इस तरह के उपकरण बनायें, जिनके द्वारा हम आम लोग राजनीतिक प्रक्रिया में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें, अपनी सक्रिय भूमिका अदा कर सकें, और यथास्थिति के खिलाफ़ अपना व्यापक मोर्चा बना सकें।

समाधान

29) बस्तीवादी धरोहर से नाता तोड़ने के लिये और हिन्दोस्तान में एक सुखद भविष्य बनाने के लिये हमें सभ्य समाज का एक आधुनिक दृष्टिकोण और संकल्पना पेश करना होगा। यह समझना बहुत जरुरी है कि आधुनिक युग में जब उत्पादन इतना सामाजिक हो चुका है कि किसी भी विचार या वस्तु को हम किसी व्यक्ति विशेष या केवल एक निजी प्रयास का परिणाम नहीं मान सकते, तब हम कैसे कह सकते हैं कि हर एक व्यक्ति आत्मनिर्भर हो, उसे अपनी जरुरतों की पूर्ति खुद करनी होगी, कि समाज की उसके प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है, जैसी कि “मुक्त बाजार” के दावेदार बोलते हैं।

30) सदियों पूर्व हिन्दोस्तानी लोगों ने एक दृष्टिकोण अपनाया था, उसका विकास किया था, कि समाज का कर्तव्य है कि वह समाज के प्रत्येक सदस्य को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करे। और प्रजा, यानि की सभी समाज के सदस्यों के समूह, का यह अधिकार था कि वह एक ऐसा राजा चुने जो सभी सदस्यों को सुख और सुरक्षा दे सके। कुछ समय बाद जब हिन्दोस्तानी समाज में वर्ग और शोषण का जन्म हुआ, वे पनपे और एक वर्ण व्यवस्था को वर्ग विभाजन के तौर पर स्थापित किया, तो उस सदियों पुराने दृष्टिकोण को नकारा गया, बाद में ब्रिटिश बस्तीवादी शासकों ने उसे और भी व्यापक तरीके से नकारा जब उन्होंने हिन्दोस्तान में “कायदाकानून का राज” की स्थापना की, जिसके अंतर्गत निजी संपत्ति और अमीर वर्ग के द्वारा मुनाफाखोरी की व्यस्था को वैधता का जामा पहनाया गया और इस व्यवस्था को और भी विकसित किया गया। इस कायदाकानून के राज में, जो ब्रिटिश ने स्थापित किया, उनकी अंधाधुंध शोषण और लूट के खिलाफ़ उठने वाले को ‘बागी’, ‘देशद्रोही’, करार कर दिया गया और इस तरह उन्हें क्रूर तरीके से कुचला गया।

31) हिन्दोस्तानी लोगों की सदियों से चली आ रही राजनीति और राजधर्म तथा अनुभवों और सभ्यता से आये हुये और भी प्रगतिशील विचार जो आधुनिक युग की देन हैं, इनके आधार पर बने इस सिद्धांत को दृढ़तापूर्वक, फिर से दोहराने की जरूरत है, कि हिन्दोस्तानी राज्य की यह जिम्मेदारी है, कि वह समाज के हर सदस्य के लिये सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करे। आज हिन्दोस्तान हजारों वर्ष पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल है। इसलिए इस सिद्धांत को अभ्यास में लागू करने के लिये यह ज़रूरी है कि हम आधुनिक समाज में ‘सुख‘ और ‘सुरक्षा’ की परिभाषा क्या होनी चाहिये, यह भी तय करें। रोजीरोटी व्यवस्था, शिक्षा, पेय जल, घर और साफ सफाई के साधन, बिजली और संचार के उपयुक्त साधन और प्राप्ति, ये सब समाज के हर नागरिक के मूलभूत अधिकारों में सम्मिलित होना चाहिये। समाज का यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि वह और राज्य यह सुनिश्चित करे कि ये मूलभूत अधिकार लोगों को वास्तव में हासिल हों। इसके लिये आवश्यक है एक ऐसी व्यवस्था की, जो यह माने कि (1.) मानव मात्र होने से ही समाज के हर सदस्य के कुछ मूलभूत अधिकार होते हैं (2.) समाज की यह जिम्मेदारी है, जिसकी अवहेलना किन्हीं हालातों में नहीं हो सकती, कि समाज के हर सदस्य को एक आत्मसम्मानयुक्त और मानवीय जीवन जीने के सभी साधन और हालत प्राप्त हों।

32) समाज में कई समूह हैं जिनके अपनेअपने अधिकार और हित हैं। परन्तु आज की मौजूदा सरकार की नीति केवल बड़ेबड़े औद्योगिक घरानों और बड़ीबड़ी कंपनियों तथा वित्तीय संस्थानों के हितों और उनके निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये उपयुक्त है। वह समाज के और सदस्यों और समूहांे के अधिकारों को नगण्य समझती है, उनकी अवहेलना और उपेक्षा करती है। हर दिन जो भ्रष्टाचार के कारनामें खुलकर सामने आ रहे हैं, वे यही दर्शाते हैं कि हिन्दोस्तान की नीतियां और सरकार केवल बड़ेबड़े उद्योगपतियों के हित में और उन्हीं के द्वारा संचालित होती हैं।

33) यदि देश की आर्थिक व्यवस्था को मेहनतकश लोगों के हित में, उनके अधिकारों की पूर्ति के लिये चलाना है तो आम लोगों को समाज के सभी मुख्य फैसलों में अपनी भूमिका अदा करनी होगी। एक ऐसी राज्य व्यवस्था की स्थापना करनी होगी जिसमें कुछ मुट्ठीभर लोग, जो समाज की सर्वोच्च फैसले लेने की ताकत और विशेषाधिकारों का आनंद ले रहे हैं, उन्हें इससे वंचित करना होगा और यह अधिकार, यह ताकत आम लोगों के हाथ में सौंपना होगा। इस तरह की राज्य व्यवस्था व्यक्ति, समूह और समाज के अलगअलग हितों और अधिकारों की पूर्ति के लिये यह संतुलित नजरिये से काम करेगी। ऐसी राज्य व्यवस्था उन सभी व्यक्तियों और समूहों को दबायेगी जो लोगों के हितों और अधिकारों की उपेक्षा और अवहेलना करके आगे बढ़ना चाहते हैं अपने निहित स्वार्थों के लिये, जो समाज के हितों को नगण्य समझते हैं। इस तरह की खुदगर्ज ताकतों को न पनपने देना और उनके द्वारा समाज की दिशा तय करने में दखलंदाजी को रोकना और उन्हें इन अधिकारों से वंचित करना, लोगों के हाथ में प्रभुसत्ता हासिल और कायम रखने की यह एक जरूरी शर्त है, एक आवश्यक परिस्थिति है।

34) लोगों के हाथ में प्रभुसत्ता आने के बाद, वे समाज में मौजूदा आर्थिक व्यवस्था, जो लोगों के खिलाफ़ है, उसे एक नई दिशा में, एक नये आधार पर पुनर्गठित करेंगे, ताकि सभी उत्पादक साधनों की दोनों प्राकृतिक एवं मानवीय सुरक्षा हो सके, उनका सत्त विकास हो सके। आर्थिक नीतियों का उद्देश्य लोगों की खुशहाली सुनिश्चित करना और समाज की भविष्य की आवश्यकताओं, पर्यावरण और उत्पादक साधनों के विकास और सत्त पुनःउत्पादन सुनिश्चित करना होगा। जिस तरह की व्यवस्था आज देश में चल रही है, जिसमें कुछ मुट्ठीभर लोग अपने मुनाफों की अधिकतम दर निश्चित करने के लिये समाज की भावी और वर्तमान आवश्यकताओं को नकारते हुये, अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं और उसके दुष्परिणाम आम लोग और समाज तथा आगे आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी, इस तरह की लूट करने की व्यवस्था के लिए, लोगों की बनाई हुई नई आर्थिक व्यवस्था में, कोई अनुमति नहीं होगी।

35) लोगों के हाथ में सत्ता आने के बाद उनका सबसे पहला कदम यह होगा कि किस तरह से समाज में गरीबी, निरक्षरता, साधारण बीमारी जैसी समस्याओं का नामों निशान भी मिटा दिया जाए। यह सब करने के लिये जो भी धन चाहिये, वह उन्हें मिलेगा, क्योंकि जिस व्यवस्था में कुछ मुट्ठीभर लोग सरकारी खजाने को लूटते हैं, वह व्यवस्था खत्म हो गई होगी। इस तरह का तात्कालिक आपातकालीन कार्यक्रम लागू किया जायेगा, जिसके तहत सभी विदेशी संस्थानों जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक आदि को ब्याज के भुगतान पर रोक लगाई जायेगी। समाज में बहुत से अमीर लोगों के पास गैरहिसाबी और काले धन को तुरंत निकाला जा सकता है, यदि नये करेंसी नोट को मान्यता दी जाये। इस तरह के कदमों से बहुत सा धन जो जुटाया जायेगा, उसे लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में लगाया जायेगा। इस नयी व्यवस्था में राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि एक आधुनिक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था सामाजिक हित के लिये काम करे और सभी आवश्यक वस्तुयें अच्छी गुणवत्ता वाले, पर्याप्त मात्रा में एवं उचित दामों पर, सभी को आसानी से उपलब्ध हों।

36) जब लोगों के हाथ में प्रभुसत्ता होगी तो वे अपने देश की राजनीतिक और आर्थिक आजादी की सुरक्षा, आत्मनिर्भरता के सिद्धांत पर, कर सकते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि वे दुनिया से अलग हो जायेंगे। इसका अर्थ केवल यही है कि विदेशी व्यापार राज्य के हाथों में होगा और इस क्षेत्र के सभी तरह के बिचैलियों की मुनाफाखोरी बंद होगी। आयात उन्हीं वस्तुओं का होगा जो हिन्दोस्तानी लोगों की जरूरत है: अधिकतम वस्तुओं का उत्पादन हिन्दोस्तानी लोग स्वयं ही कर सकेंगे। हिन्दोस्तान से निर्यात लोगों की अनुमति के बिना नहीं हो सकेगा। लोगों की राय और सहमति के बिना कोई भी विदेशी कर्ज और सहायता नहीं ली जायेगी।

37) सभी की सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हिन्दोस्तानी लोगों को एक नये संविधान की, और इस आधार पर बनी एक नयी राज्य व्यवस्था की रचना करनी होगी। लोगों के हाथ प्रभुसत्ता का अर्थ है कि आम लोग अपने निवास और कार्यस्थान पर संगठित तरीके से अपनी भूमिका अदा करें और समाज के हित में सभी फैसलों को लेने की सर्वोच्च ताकत इन संगठित लोगों के हाथों में हो। जब लोग अपने प्रतिनिधि या कमेटियां चुनेंगे, वे अपनी सब प्रभुसत्ता उनके हाथ में नहीं सौप देंगे, बल्कि केवल उसका एक अंश और वह भी कुछ समय के लिये। हर समय लोगों के हाथ में यह अधिकार होगा कि वे अपने प्रतिनिधियों से उनकी भूमिका और उनकी कार्य गतिविधियों का लेखाजोखा लें और यदि जरूरत हो, तो उनको वापस बुलायें। संविधान लोगों को यह अधिकार देगा कि प्रतिनिधि केवल वही फैसले लागू करें जो उस समूह, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं, उसकी सहमति से लिये गये हैं। जिन्होंने प्रतिनिधि चुना है, वही फैसले ले सकते हैं। प्रतिनिधि उन सामूहिक फैसलों और दिशा को किसी भी हालत में नही बदल सकते। यदि फैसले को बदलने की जरूरत है तो प्रतिनिधि को उसी समूह, जिसने उसे चुना है, उसके पास वापस आना होगा और उस समूह की अनुमति लेनी होगी। कार्यकारी दल और सत्ता, वैधानिक ताकत के हमेशा अधीन होगी और वैधानिक ताकत पर लोगों का सीधा नियंत्रण होगा।

38) इस तरह की राज्य व्यवस्था, जो उपरोक्त सिद्धांतों पर आधारित होगी, इसमें यही सिद्धांत सभी स्थानों पर लागू होगा। देश के विभिन्न राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और आदिवासी लोगों द्वारा बनायी गई सरकारों के पास केवल वही अधिकार होंगे जो उनको दिये गये हैं। अपने निवास और कार्यस्थानों में संगठित विभिन्न समूह यह सुनिश्चित करेंगे कि किस प्रतिनिधि और किस सरकार को कितनी ताकत या फैसले लेने कि कितनी क्षमता प्रदान करें। लोगों के नाम पर, सरकारें और प्रतिनिधि मनमानी नहीं कर सकेंगे। विभिन्न सरकारों को जो जिम्मेदारियां और उसके लिये जो अधिकार लोग देंगे, उसके अलावा बाकी सभी अधिकार लोगों के पास, समाज के मूलभूत, बुनियादी संगठनों के पास ही रहेंगे। इसी तरह से हिन्दोस्तानी संघ के पास, केन्द्रीय सरकार के पास, केवल वे ही अधिकार रहेंगे, जो उसके विभिन्न घटकों, राज्य सरकारों ने उनको दी है। अन्यथा प्रभुसत्ता, फैसले लेने का अधिकार लोगों के पास ही रहेगा।

39) इस तरह की राज्य व्यवस्था में, एक नई राजनीतिक प्रक्रिया की आवश्यकता होगी, जिसमें राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आने के लिए नहीं बल्कि लोगों की सोच, चेतना और आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए काम करेंगी, ताकि लोग राज सत्ता को चलाने के लिये हर तरह से सक्षम हों। नया संविधान यह सुनिश्चित करेगा कि किसी भी ऐसी पार्टी जो सत्ता में, गद्दी हड़पने के लिए काम करती है, उसको न पनपने दिया जाये। राजनीतिक पार्टियां लोगों के नाम पर राज नहीं कर सकतीं। वे लोगों को फैसले की प्रक्रिया से वंचित नहीं कर सकतीं।

40) इस तरह की नई राज्य व्यवस्था और नई राजनीतिक प्रक्रिया को स्थापित करने और विकसित करने के दृष्टिकोण से हिन्दोस्तानी लोगों को तुरंत एक निष्पक्ष और गुटवादहीन तरीके से राजनीतिक कार्यों और संघर्षों को दिशा देने के लिये संगठनों को स्थापित करना होगा। उनके द्वारा ही वे अपने मूलभूत अधिकारों की रक्षा करने के लिये लड़ सकेंगे। लोगों को इस तरह के बुनियादी संगठन अपने निवास स्थानों पर, कार्यरोजगार की जगहों पर, हर शहर और जिलों में प्रस्थापित करने होंगे, साथ ही साथ अपनी तात्कालिक मांग और कार्यक्रम को आगे रखकर लड़ना होगा। इस तरह के संगठनों को देश के कोनेकोने में स्थापित करने होंगे। इनके जरिये लोग एक संगठित तरीके से सत्ता अपने हाथ में लेने की तैयारी कर सकेंगे।

तात्कालिक कार्य और मांगें

41) आज हिन्दोस्तानी लोगों की सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण जरूरत यह है कि उन्हें ‘राजनीतिक’ होना पड़ेगा। यानि कि अपने अधिकारों के लिए एक संगठित ताकत बतौर लड़ना पड़ेगा। लोगों को ऐसे तरीके अपनाने हांेगे जिससे कि वे अपनी राजनीतिक भूमिका अदा कर सकें। सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों के सामने यह एक बहुत ही तात्कालिक कार्य है कि इस तरह के साधन बनायें और मजबूत करें, जिनसे वे समाज के केन्द्र में आ सकें। आज वे बिल्कुल बेबस, हीन और असमर्थ, राजनीतिक प्रक्रिया के बाहर और उससे बिल्कुल वंचित महसूस करते हैं। इस दीवार को तोड़ना होगा।

42) जो सत्ताधारी वर्ग की पार्टियां या संगठन हैं, वे ‘राजनीति’ की परिभाषा इस तरह से करते हैं, ताकि लोगों की सत्ता में कोई भूमिका न हो। इस परिभाषा बतौर राजनीति में हिस्सा लेने का मतलब है इस या उस संसदीय पार्टी के वोट बैंक बन जाओ और उनको जिताने का काम करो। लोगों के पास आज एक चुनौती है कि राजनीति के इस घिनौने तरीके और दृष्टिकोण को नकारें, जो उन पर दिन पर दिन थोपा जा रहा है, और सच्चे राजनीतिक पहलुओं को लेकर नये तरीकों से राजनीति में हिस्सा लें।

43) हिन्दोस्तान की सामाजिक संपदा करोड़ों लोगों के प्रयत्न और श्रम का परिणाम है और इसलिये इस सामाजिक उत्पादन और धन पर हर मेहनतकश का जायज़ हक़ है। उनका पूरा अधिकार है कि वे यह तय करें कि इस सामाजिक संपत्ति का वितरण कैसे हो और समाज के विभिन्न घटकों और समूहों को क्या मिले। आज की मौजूदा व्यवस्था उनके इस अधिकार का उल्लंघन करती है उनको इस राजनीतिक भूमिका से वंचित करती है। इसलिए उन्हें नये तरीके ढूंढ़ने होंगे जिनके द्वारा वे अपने इस अधिकार को दृढ़तापूर्वक लागू कर सकें, उसकी रक्षा कर सकें।

44) इसलिए आज सभी सच्ची राजनीतिक ताकतों के सामाने एक चुनौती यह है कि किस तरह से हिन्दोस्तान के हर मोहल्ले, गांव, बस्ती, शहर, राष्ट्र या संपूर्ण देश के स्तर पर लोगों के संघर्ष करने के उपकरण बनायें और मजबूत करें। कुछ निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये राजनीतिक सत्ता को हड़पने वाले खुदगर्ज इंसानों की ताकत को हमें एक राजनीतिक तौर पर संगठित लोगों की तरफ से चुनौती देनी होगी। लोगों के सभी लड़ाकू संगठनों को हर तरह से चुनौती की लड़ाई में भाग लेना होगा, जिससे कि लोगों के मूलभूत अधिकारों और मांगों को देश की राजनीति के केंन्द्र पर लाया जा सके। इसके लिये उन्हें चुनाव प्रक्रिया में भी भाग लेना पड़ेगा, यदि जरूरत पड़े या उचित हो।

45) निम्नलिखित तात्कालिक मांगों के इर्दगिर्द हमें सभी को एकजुट करने की कोशिश करनी चाहिये। हमें अपना कार्य बड़े ही उदार दृष्टिकोण से, धर्म, जाति, लिंग, भाषा, पार्टी आदि के मतभेदों से ऊपर उठकर, उनके परे, लोगों की लड़ाकू एकता के लिये संघर्ष करना पड़ेगा। इन तात्कालिक मांगों के लिए लोगों की एकता सुदृढ़ करने में, अपने प्रयासों को एक दिशा और निशाना देने में सहायता करेगा और अपने देश भर में जन संघर्ष के जनसंगठनों को मजबूत करने में सहायता करेगा। वे सभी ताकतें जो इस देश को उन्न्ाति के रास्ते पर देखना चाहती हैं, जो इस देश के नवीकरण में रुचि रखती हैं, उन सबको एक साथ मिलकर एक राजनीतिक मोर्चे का निर्माण करना होगा। यह संघर्ष उन ताकतों के खिलाफ होगा, जो समाज में लोगों को किसी न किसी बहाने बांटना चाहती हैं, जो इस मौजूदा व्यवस्था को कायम देखना चाहती हैं और समाज के नवीकरण और प्रगति के पथ पर एक रोड़ा है।

सेना का राज, राजकीय आतंकवाद और लोगों के खिलाफ़ हिंसा का अंत हो

46) आम लोगों द्वारा राजनीति में हिस्सा लेने की हालतें तभी पैदा होंगी, जब उनके खिलाफ़ नाना प्रकार की हिंसा के माहौल का अंत होगा। लोगों के राजनीतिक प्रश्नों और आर्थिक समस्या का हल ढूंढ़ने के बजाय, उन्हें ”कायदाकानून“ में बदलने की प्रवृत्ति और सरकार की नीतियों का जबरदस्त विरोध करने की आवश्यकता है। लोगों में राजनीतिक चेतना लाने का मतलब यह है कि सर्वप्रथम वे सत्ता में बैठे लोगों की जनता के आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों से हिंसा या राजकीय आतंक द्वारा निपटने की नीति को समझें और इसका विरोध करें। यह फर्क नहीं पड़ता कि देश के किस हिस्से में और समाज के किस तबके पर यह हमला होता है, हम सबको एक आवाज़ में इसका मुहतोड़ जबाब देना होगा, क्योंकि “एक पर हमला सभी पर हमला“ है।

  • उन सभी काले कानूनों को, जिनके द्वारा लोगों को अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित किया जाता है, रद्द करो!
  • कश्मीर, नगालैंड, मणिपुर और देश के विभिन्न हिस्सों में सेना का राज खत्म करो और सेना को नागरिक क्षेत्रों से हटाओ!
  • लोगों के आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों और समस्याओं को बलपूर्वक या हिंसा के द्वारा दबाने की नीतियों का विरोध करो!

अधिकारों की रक्षा राज्य की जिम्मेदारी है

47) वर्तमान हिन्दोस्तानी राज्य सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा नहीं करता। हिन्दोस्तानी संविधान लोगों के बहुत ही बुनियादी मानवीय अधिकार, जैसे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य का अधिकार, जातिवादी दमन से त्रस्त लोगों की सुरक्षा और उसका अंत, आदि, इन सब अधिकारों को मूलभूत अधिकारों का दर्जा नहीं देता। उनको संविधान में केवल एक नीति निर्देश की तरह सम्मिलित किया गया, यानि कि उसके लिये हिन्दोस्तानी नागरिक अदालत के दरवाजे भी नहीं खटखटा सकते। हिन्दोस्तान के संविधान में ऐसा कोई कानून नहीं है जिससे लोगों को ये मूलभूत अधिकार हासिल हो सकें। ऐसा साधन नहीं है, कि जो कायदाकानून लोगों के हित में बनते हैं उनको लागू किया जाये। राजनीतिक चेतना का सबसे जरूरी अंग यह है कि लोग अपने बुनियादी अधिकारों के लिए संवैधानिक गारंटी और उन्हें अभ्यास में हासिल करने के साधनों की मांग करें। इस संघर्ष का उद्देश्य यह होना चाहिये कि किसी भी हालत में लोगों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन न हो।

  • सभी को रोजगार सुनिश्चित करने के लिये संवैधानिक गारंटी हो!
  • सामाजिक स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा का अधिकार संविधान में सुनिश्चित मूलभूत अधिकार हो!
  • महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को संविधान में शामिल किया जाये!
  • जातिवादी दमन और भेदभाव करने वालों को स्पेशल कोर्ट में तुरंत मुकदमा चलाकर, कड़ी से कड़ी सजा दी जाये, जिससे इस तरह के गुनाह न किये जा सकें!
  • हर हिन्दोस्तानी राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और आदिवासी लोगों को संवैधानिक गारंटी हो कि वे अपने भविष्य के खुद मालिक हैं!
  • इन सभी अधिकारों को लागू करने के लिये और इनके उल्लंघन के लिये राज्य की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक उपकरण बनाये जायें!

राजकीय प्रक्रिया का नवीकरण

48) चुनावी प्रक्रिया और सरकारों का गठन आज की मौजूदा व्यवस्था में बहुत ही अपराध ग्रस्त हो गया है। आम लोग या तो वोट बैंक की तरह इस या उस पार्टी को सत्ता में लाने के साधन हो गये हैं या फिर पूरी तरह से असंतुष्ट होकर इस प्रक्रिया के बाहर किनारे पर खड़े हैं, जैसे कि उनका इससे कोई वास्ता नहीं है। लोगों को आज इस तरह के बदलाव की मांग करनी चाहिये, जिससे इस अपराधीकरण का खात्मा हो, आम लोगों को अपनी भूमिका अदा करने में सहायता मिले और चुनावी प्रक्रिया पर संसदीय पार्टियां, जो लोगों के नाम पर सत्ता में आकर मनमानी करना चाहती हैं, उनकी दादागीरी और नियंत्रण खत्म हो। लोगों को एक ऐसी मांग आगे लानी होगी जिससे एक नये संविधान की रचना हो और उसके तहत दोनों ही ताकतें, वैधानिक और कार्यकारी, लोगों के नियत्रण में हों।

  • हर निवास स्थान और काम के स्थानों पर लोगों की समितियों का चयन करो!
  • इन इलाका समितियों की जिम्मेदारी होगी कि वे चुनावों में खड़े होने वाले लोगों का चयन करें और जरूरत पड़ने पर निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलायें और नये कायदाकानून लाने या मौजूदा कायदाकानूनों को बदलने के लिये प्रस्ताव पेश करें!
  • हिन्दोस्तान के एक नये संविधान का मसौदा बनाने के लिये एक संविधान सभा का चयन करें, जिसके द्वारा बनाये गये नये संविधान का मसौदा लोगों के सामने चर्चा और सहमति के लिये रखा जाये।

आर्थिक नीति की नई दिशा तय करना

49) एक ऐसा सिद्धांत जिसके तहत यह माना जाता है कि जो भी बड़ीबड़ी कंपनियों और उद्योगपतियों के लिये अच्छा है, उसी से देश का भला हो सकता है, इस सिद्धांत को बदलकर एक नया सिद्धांत प्रस्थापित करना होगा, कि हर हिन्दोस्तानी नागरिक की खुशहाली ही पूरे हिन्दोस्तानी समाज की खुशहाली की शर्त है। इस नये सिद्धांत के तहत लोगों को, बड़ीबड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियोंं, बड़े औद्योगिक घरानों, वित्तीय संस्थानों द्वारा

हिन्दोस्तानी सार्वजनिक खजाने और सभी प्राकृतिक या मानवीय संसाधनों की लूट को बंद करने और इन सभी संसाधनों और धन को लोगों की खुशहाली, उनकी जरूरतों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करने, की मांग उठानी होगी।

  • विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा दिये गये कर्जाें के मूलधन और ब्याज का भुगतान रोका जाये!
  • अर्थव्यवस्था में सारे गैरहिसाबी धन और काले धन को एक नई करेंसी चलाकर निकाला जाये और जब्त किया जाये!
  • इस तरह से जुटाया गया धन लोगों की जरूरतों को पूरा करने और निश्चित समय में गरीबी और निरक्षरता जैसे हालातों को खत्म करने और लोगों के जीवन स्तर को ऊपर करने में इस्तेमाल किया जाये!
  • सामाजिक संपत्ति को निजी मुनाफाखोरों के हाथ बेचना बंद किया जाये!
  • साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा संचालित विश्व व्यापार संघ से हिन्दोस्तान को बाहर आना चाहिये!
  • मजदूरों और किसानों की रोजीरोटी के साधन सुनिश्चित हों!

अंतर्राष्ट्रीय नीति की नई परिभाषा

50) हिन्दोस्तान की विदेश नीति दक्षिण एशिया में शांति और सुरक्षा को बढ़ावा नहीं देती। यह नीति हिन्दोस्तान औैर इस उपमहाद्वीप में निवासी राष्ट्रों और लोगों की प्रभुसत्ता सुरक्षित करने में सहायक नहीं है। हिन्दोस्तानी लोगों को एक होकर वर्तमान शासक वर्गों की खतरनाक और साम्राज्यवादी साजिशों के खिलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिये। हमें एक विकल्प की मांग करनी चाहिये जिसका आधार अपने पड़ोसी देशों के साथ सच्चा मैत्रीपूर्ण संबध होगा और अमरीकी व अन्य साम्राज्यवादी शाक्तियों के विरुद्ध एक एकजुट संघर्ष होगा।

  • अमरीकी “आतंकवाद पर जंग” का विरोध करें और हिन्दोस्तानी सरकार का अमरीकी सेना और राज्य के साथ सहयोग और खतरनाक गठबंधन का विरोध करें!
  • बर्तानवीअमरीकी साम्राज्यवादियों की दक्षिण एशिया क्षेत्र में दखलंदाजी का विरोध करें!
  • दक्षिण एशिया में शांति के लिए सक्रियता से काम करें!
  • संयुक्त राष्ट्र संघ का लोकशाहीकरण किया जाये, उसकी जनरल असैंबली में प्रभुसत्ता स्थापित की जाये और सुरक्षा समिति की स्थायी सदस्यता खत्म की जाये!

लोक राज संगठन का आह्वान

51) हम सब जो लोगों के हाथों में प्रभुसत्ता हासिल करने के लिये काम करना चाहते हैं, हममें हर एक जहां भी रहता है या काम करता है, वहां पर कम से कम एक संघर्ष करने लायक संगठन का निर्माण करें। ये प्रजा सभाएं लोक राज समितियों का फिर चयन कर सकती हैं। हम सब यह निश्चय करें कि इन संगठनों को मजबूत करेंगे, जिससे ये निकट भविष्य में लोगों की सत्ता के साधन बन सकें।

52) हर एक फैक्टरी और मोहल्ले में, गांव, शहर और जिले में, आइये हम सब अपने सामूहिक संघर्षों से जन्मी अन्य मांगों को उठायें। दूसरे शब्दों में, लोक राज संगठन द्वारा प्रस्तावित यह ड्राफ्ट प्रोग्राम लोगों के अनुभवों और संघर्षों से और भी विकसित होगा, मजबूत बनेगा। लोगों के संघर्षों से आयी हुई ये सब मांगें भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनती जायेंगी, जैसेजैसे हम हर साल इस कार्यक्रम में आवश्यकतानुसार, नई बातें जोड़ते रहेंगे।

53) हम सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं से गुज़ारिश करते हैं कि मजदूरों, किसानों, महिलाओं, नौजवानों और अन्य शोषित, दबीकुचली जनता के बीच हमेशा सक्रियता से काम करें, इसी उद्देश्य से ही, कि लोगों के हाथ प्रभुसत्ता हासिल की जाये।

54) लोक राज संगठन लोगों के बीच, चाहे वे किसी भी पार्टी या विचारधारा से जुड़े हों, राजनीतिक एकता बनाने और मजबूत करने के लिये वचनबद्ध है। जो भी हिन्दोस्तानी समाज को इस गहरे संकट से निकालने के लिये सभी की राजनीतिक एकता बनना चाहते हैं, उन सबको लोक राज संगठन साथसाथ काम करने का आह्वान करता है। लोक राज संगठन का मत है कि हिन्दोस्तान के लोकशाही नवीनकरण का कार्यक्रम सभी सांझे हिन्दोस्तानियों का सांझा कार्यक्रम है। इसलिये उन सभी राजनीतिक संगठनों और पार्टियों, जो एक नये हिन्दोस्तान के नवनिर्माण में रुचि रखते हैं, उन सबको आगे आने वाले समय में एक बहुत ही अहम् भूमिका निभानी होगी। जो पार्टी या संगठन, हिन्दोस्तान के लोकशाही नवनिर्माण का कार्यक्रम सभी हिन्दोस्तानियों का कार्यक्रम है। केवल लोगों को वोट बैंक की राजनीति में फंसाकर उनका इस्तेमाल करके, इस सड़ीगली राजनीतिक प्रक्रिया और व्यवस्था को कायम रखना चाहते हैं, उनका लोक राज संगठन के कार्यक्रम में कोई स्थान नहीं है। लोक राज संगठन सभी राजनीतिक ताकतों, निर्दलीय उम्मीदवार, छोटीछोटी पार्टियों और प्रगतिशील संगठनों के साथ मिलकर इस व्यवस्था से जुड़ी हुई ”संसदीय“ ”मान्यता प्राप्त“ पार्टियों के शिकंजे से देश की राजनीतिक प्रक्रिया को मुक्त करने के लिये हर संभव प्रयत्न करेगा।

लोक राज संगठन का जन्म व उद्देश्य

55) लोक राज संगठन का जन्म 1993 में हुआ था जब हिन्दोस्तानी समाज एक गहरे संकट से गुजर रहा था, जब बाबरी मस्जिद का विनाश किया गया था और उसके पश्चात हिंसा का आयोजन किया गया था। उस समय नयी दिल्ली में सब राजनीतिक प्रदर्शनों पर रोक लगी थी और चारों तरफ अस्तव्यस्तता और आतंक का माहौल फैलाया गया था। उसी समय, 22 फरवरी 1993 को, दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में हमारे संगठन का बीज बोया गया था।

56) लोक राज संगठन का जन्म कमेटी फाॅर पीपल्स एंपावरमेंट (सीपीई) के नाम से हुआ था। यह आम जनता का गैर पार्टीवादी संगठन है। संसदीय बड़ी पार्टियों द्वारा राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ व बहुसंख्यक लोगों की सत्ताहीनता के हालातों को खत्म करने के लिये, सभी तबकों के लोगों द्वारा यह एक पहल थी। इस संगठन का मूल तत्व इन शब्दांे में घोषित किया गया था: वर्तमान व्यवस्था और लोकतंत्र की प्रक्रिया आबादी के अधिकतम हिस्से को सत्ता से वंचित रखती है इसलिए लोगों को एक नई व्यवस्था और नई राजनीतिक प्रक्रिया, लोकतंत्र के नवीकरण की जरुरत है, ताकि वे खुद अपने हाथों में सत्ता ले सकें।

57) 1993 से 1998 तक की अवधि की घटनाओं और लोगों को सशक्त करने के अपने कार्य की समीक्षा करते हुये, मई 1998 में पुणे में आयोजित एक आम सम्मेलन में, सीपीई ने अपनी भूमिका व कार्यों के दायरे का और विस्तार करने का फैसला लिया। जनवरी 1999 में सीपीई का पुनर्गठन लोक राज संगठन के नाम से हुआ एक ऐसा देशव्यापी राजनीतिक संगठन जिसका मकसद है एक नई राजनीतिक शक्ति का निर्माण करने के जरिये, लोगों का प्रभुसत्ता की पुष्टी करना।

58) लोक राज संगठन के सदस्य व कार्यकर्ता समाज के हर तबके से हैं। इनमें मजदूर, किसान, नौजवान, विद्यार्थी, महिला व मानव अधिकार संगठनों के कार्यकर्ता, शिक्षक, प्राध्यापक, सेवा निवृत्त न्यायाधीश व सरकारी अफसर शामिल हैं। पश्चिम में महाराष्ट्र से लेकर उत्तर में दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, और दक्षिण में तमिलनाडु व केरल तक, लोक राज संगठन की शाखाएं कई शहरों व जिलों में हैं। साथ ही, पूर्व व उत्तरपूर्व में नयी शाखाएं स्थापित की जा रही हैं। विद्यार्थी परिसरों, कारखानों व मुहल्लों में लोक राज संगठन की स्थानीय शाखाएं स्थापित की जा रही हैं।

59) लोक राज संगठन का देशव्यापी नेतृत्व एक केन्द्रीय कार्यकारी समिति करती है, जबकि हर इलाके में चुनी हुई इलाकासमितियां वहां के कार्य का नेतृत्व करती हैं। केन्द्रीय कार्यकारी समिति एक न्यूजलेटर निकालती है, जिसका वितरण नियमित तौर पर सभी सदस्यों को किया जाता है। राजनीतिक सभाओं, रैलियों और मुख्य सम्मेलनों का आयोजन नियमित तौर पर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, पुणे, तिरूवनंतपुरम आदि स्थानों पर होता है। इन सभी कार्यक्रमों की खास खूबी यह है कि इनमें हिन्दोस्तान के नवीकरण की जरूरत के इर्द सभी लोगों की एकता पर जोर दिया जाता है। लोक राज संगठन के प्रतिनिधिमंडलों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया है, जैसे कि सियाटल में साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के खिलाफ़ हुये जन प्रदर्शन में। लोक राज संगठन ने जनता पर थोपे गये निजीकरण के खिलाफ, संघर्षरत मजदूरों का जोरदार समर्थन किया। लोक राज संगठन की बेबसाईट (www.lokraj.org.in) में सभी तरह के लोगों ने रुचि दिखाई है, जिनमें प्रवासी हिन्दोस्तानी व विदेश में पढ़ रहे हिन्दोतानी भी शामिल हैं।

60) हिन्दोस्तान के नवीकरण व लोगों के हाथों प्रभुसत्ता लाने के कार्यक्रम में सहभाग और योगदान देने के इच्छुक सभी हिन्दोस्तानी लोगों और प्रवासी हिन्दोस्तान के लिये लोक राज संगठन की सदस्यता खुली है।

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