1984 में राज्य द्वारा आयोजित सिखों के जनसंहार की 33वीं बरसी पर, अनेक संगठनों के सैंकड़ों कार्यकर्ताओं ने आज दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन किया।
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इस कार्यक्रम को आयोजित करने वाले थे – लोक राज संगठन, जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द, पोपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, सिख फोरम, यूनाइटेड मुस्लिम्स फ्रंट, सीपीआई (एम.एल.) न्यू प्रोलेतेरियन, सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया), सोषल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स, एस.ए.एच.आर.डी.सी., मज़दूर एकता कमेटी, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया, सिटीजन्स फॉर डेमोक्रेसी, आल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत (दिल्ली राज्य), पुरोगामी महिला संगठन, सांइटिफिक सोशलिज्म जर्नल, हिन्द नौजवान एकता सभा, एन.सी.एच.आर.ओ., स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन।
रैली में लोगों को संबोधित करते हुये, सभी संगठनों के वक्ताओं ने बताया कि यह रैली हमारा दृढ़ ऐलान है कि अलग-अलग समुदायों को निशाना बनाकर उन पर किये गये हमलों तथा राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और जनसंहार का हम डटकर विरोध करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि मेनस्ट्रीम मीडिया, शासक और विपक्ष की पार्टियों तथा सरकार ने इस विषय पर पूरी चुप्पी साध रखी है। वे चाहते हैं कि हिन्दोस्तान के लोग राज्य द्वारा आयोजित उस भयानक अपराध को भूल जायें। वे प्रस्ताव कर रहे हैं कि हमें राज्य के गुनाहों को भूलकर उन्हें माफ कर देना चाहिये। परन्तु हमने इस रैली को आयोजित करके उनके भूलने और माफ करने के प्रस्तावों को खारिज कर दिया है। हम गुनहागारों को सज़ा दिलाने की मांग कर रहे हैं और लोगों से आह्वान कर रहे हैं कि हम एक ऐसा समाज बनायें जिसमें इस प्रकार के अपराधों को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।
नवम्बर 1984 का जनसंहार कोई स्वतःस्फूर्त उभार नहीं था, बल्कि राज्य द्वारा बड़े सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया घोर अपराध था। उसके लिये कई दिनों पहले से तैयारी की गई थी। ढेर सारा सबूत यह दिखाता है कि उस अपराध को सत्ता के उच्चतम स्तरों पर आयोजित किया गया था और सत्ताधारी पार्टी, मंत्रीमंडल, सुरक्षा तंत्र व अफसरशाही, सभी इसमें शामिल थे।
वह जनसंहार हमारे शासकों की “बांटो और राज करो” की रणनीति का हिस्सा था। यह “बांटो और राज करो” की रणनीति राजनीतिक पार्टियों और उनकी सरकारों का एक पंसदीदा हथियार है, जिसको इस्तेमाल करके वे अपने शासन को स्थाई रखते हैं और उन नीतियों को बढ़ावा देते हैं, जो जनता के हितों के खिलाफ़ हैं और सिर्फ बड़े-बड़े औद्योगिक घरानां के हित में है।
दोनों, कांग्रेस पार्टी और भाजपा इस प्रकार की अपराधी हरकतों को आयोजित करती रहती हैं, कई वक्ताओं ने इस पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को उस झूठे प्रचार से चौकन्ने रहना चाहिए कि हमारे सामने एक धर्मनिरपेक्ष मोर्चा और एक सांप्रदायिक मोर्चा है और हम इन दोनों के बीच में चुन सकते हैं। इन दोनों पार्टियों ने लोगों के खिलाफ़ बार-बार सांप्रदायिक हिंसा और आतंक आयोजित किया है। उन्होंने एक दूसरे का बचाव किया है, जबकि लोगों को यह कहकर बुद्धू बनाया है कि अगर वे सरकार में चुने जाये तो इंसाफ दिलायेंगे।
जिस प्रकार 1984 के जनसंहार के असली अपराधियों को अभी भी सज़ा नहीं मिली है, ठीक उसी तरह बाबरी मस्जिद का विनाश आयोजित करने वाले तथा 1992-93 में मुसलमानों का कत्लेआम
कराने वाले, 2002 में मुसलमानों का हत्याकांड आयोजित करने वाले तथा तमाम और जनसंहार के कांडों को आयोजित करने और अंजाम देने वाले अपराधी आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। 1984 से आज तक, खास समुदायों पर हमले बहुत बढ़ गये हैं। सुरक्षा बलों द्वारा मुठभेड़ में हत्याएं, यू.ए.पी.ए. जैसे काले कानूनों के तहत उत्पीड़न और जेल में यातनाएं, ‘गौ रक्षा’ के नाम पर आयोजित और राज्य द्वारा सुरक्षित कातिलाना गुण्डों के हमले – यह सब अनवरत चल रहा है और बार-बार, और भयानक रूप से हो रहा है। अगर कोई व्यक्ति या संगठन इन हमलों का विरोध करता है तो उसे “राष्ट्र-विरोधी” और “आतंकवादियों” व “उग्रवादियों” से जुड़ा हुआ करार दिया जाता है।
हम राज्य प्रशासन की इन पार्टियों पर यह भरोसा नहीं रख सकते कि वे सांप्रदायिक हत्याकांड आयोजित करने वालों को सज़ा देंगे या सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंकवाद को खत्म करेंगे, क्योंकि वे खुद ही हिन्दोस्तानी राज्य की सांप्रदायिक “बांटो और राज करो” की रणनीति में लिप्त हैं। सरकार चलाने वाली पार्टी को बदलने से सांप्रदायिक हिंसा का स्रोत नहीं मिटेगा। लोगों को सत्ता में लाने की जरूरत है ताकि लोग यह फैसला कर सकें कि हमारे समाज को कैसे चलाना चाहिये। हमारे समाज का नयी बुनियादों पर नवनिर्माण करने की जरूरत है, ताकि एक पर हमला सब पर हमला माना जाये और राज्य अपने सभी नागरिकों की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करने को बाध्य हो।
रैली में सभी वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वर्तमान राजनीतिक और चुनावी प्रक्रिया में लोगों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया जाता है। जब लोगों को अपने उम्मीदवारों का चयन करने तथा उन्हें चुनने का अधिकार होगा, अपने हितों के खिलाफ़ काम करने वाले प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार होगा, कानून प्रस्तावित करने का अधिकार होगा, तब ही वे राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ़ ठोस कदम उठा सकेंगे। रैली में भाग लेने वालों ने यह फैसला घोषित किया कि धर्म, जाति, भाषा, आदि के आधार पर किये जा रहे हमलों से मुक्त समाज का निर्माण करने के लिये वे लोगों के बीच में एकता को और मजबूत करेंगे तथा लोगों को सत्ता में लाने के लिये और अधिक प्रयास करेंगे।
एस. राघवन, अध्यक्ष
1 नवम्बर, 2017


