Dharna-24Sep-1

23 सितम्बर, 2016 को देश के विभिन्न राज्यों में मुस्लिम समुदाय, ईसाइयों, दलितों और आदिवासियों पर बढ़ते हमलों और अत्याचारों के खिलाफ विभिन्न सगठनों ने एकजुट होकर संसद पर प्रदर्शन किया।

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विभिन्न संगठनों की ओर से राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को सौंपे गये ज्ञापन में मांग की गई कि

  1. गौ-रक्षा के नाम पर हो रहे हमलों व उत्पीड़न पर प्रतिबंध लगाया जाये।
  2. देश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा व तनाव की जांच हेतु आयोग बिठाया जाये।
  3. देश में हाल ही घटित कुछ प्रमुख घटनाओं जैसे कि दादरी, ऊना, डींगरहैड़ी, पैंदा, रेहाड़ा, अहमदाबाद, आदि की न्यायिक जांच कराई जाए।
  4. पीड़ितों और उनके परिवारों को समुचित मुआवजा व राहत के लिए संबंधित सरकारों को पाबंद किया जाए।
  5. देश के लोगों के बीच भाईचारे को खत्म करने, उनके बीच नफरत का जहर घोलने की मीडिया की भूमिका पर रोक लगायी जाये।
  6. सांप्रदायिक हिंसा निवारक विधेयक को जल्द से जल्द कानून बनाया जाना चाहिए।

लोक राज संगठन की तरफ से बिरजू नायक ने इस अवसर पर कहा कि आजादी के बाद से लेकर अब तक देश के विभिन्न मुख्य सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम की 54 घटनाएं हुई हैं। जिनमें ज्यादातर सांप्रदायिक घटनायें तथाकथित धर्म निरपेक्ष पार्टियों के शासन काल में हुई हैं। इस बात को हमें समझना होगा। इन सभी सांप्रदायिक घटनाओं में से सिर्फ 1984 के हत्याकांड को देखें तो इसका केन्द्र दिल्ली था। देश के सबसे बड़े लोकतंत्र की उच्च संस्था संसद के सामने, देश की न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट के सामने, पुलिस, फौज और तथाकथित लोकतंत्र के प्रहरी मीडिया के सामने हजारों लोगों का कत्लेआम हुआ, महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। संविधान की रक्षा व पालनकर्ताओं के सामने लोगों का कत्ल किया गया। लेकिन आज तक किसी को भी सज़ा नहीं हुई।

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चुनावों में पूछा जाता है कि कौन जीतेगा तो इसका स्पष्ट जवाब है कि सत्ता में वही आता है जो लोगों का कत्लेआम करता है। 1984 का कत्लेआम कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में हुआ, जिसमें उस वक्त राजीव गांधी ने अगुवाई दी थी। 1985 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और वह देश का प्रधानमंत्री बना। इस देश का इतिहास गवाह है कि लोगों के कातिल देश के प्रधानमंत्री बन जाते हैं। उसके हिसाब से 2002 में गुजरात में हुए नरसंहार के समय भारतीय जनता पार्टी का शासन था, उस वक्त नरेन्द्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे।

1980 से लेकर 1990 तक, पूरे एक दशक तक हर सिख, जो पगड़ी पहनने वाला था उसे आतंकवादी, उग्रवादी या देशद्रोही कहकर प्रचारित किया गया। उस समय राज्य के निशाने पर सिख धर्म के अनुयायी थे। अब राज्य के निशाने पर सिखों की जगह पर मुसलमान हैं, जिसकी पहचान टोपी और दाढ़ी वाले की हो गयी है।

प्रदर्शनकारियों को संबोधित करने वालों में थे – जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष नुसरत अली, बिरसा-अंबेडकर-फूले स्टूडेंट एसोसियेशन के चिन्मय महानंद, ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत के अध्यक्ष नवेद हामिद, जमियतुल उलेमा हिंद के सचिव मौलाना अब्दुल हमीद नौमानी, जमीयत अहले हदीस के महासचिव असगर अली इमाम मेहदी, दलित महासंघ आमोद के देवेंद्र भारती, वेलफेयर पार्टी के प्रमुख डॉ एस.क्यू.आर. इलियास, अखिल भारतीय शिया कांसिल के जलाल हैदर, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स इस्लामिक आर्गेनाइजेशन के लईक अहमद खान अकील, ए.पी.सी.आर. के सब्बाक आदि।

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