लोक राज संगठन का बयान, 28 अगस्त, 2014
इरोम शर्मीला, जो मणिपुर की एक ऐसी बहादुर महिला कार्यकर्ता हैं, जो बीते 14 वर्षों से, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को रद्द करने के लिये लगातार संघर्ष करती आ रही हैं, उनकी नाजायज़ और मनमाने ढ़ंग से गिरफ्तारी की लोक राज संगठन कड़ी निंदा करता है।

इरोम शर्मीला को कुछ दिन पहले रिहा किया गया था जब एक सत्रीय अदालत ने यह पाया था कि राज्य यह साबित करने में नाकामयाब रहा है कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम के विरोध में अनशन करके वह आत्महत्या करने की कोशिश कर रही हैं (हिन्दोस्तान की दंड संहिता के तहत आत्महत्या को एक गुनाह माना जाता है)। पर तीन दिन बाद उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया। 14 वर्ष से यह नाटक चल रहा है, जिसमें राज्य इरोम शर्मीला पर “आत्महत्या की कोशिश” के अलावा कोई और आरोप नहीं लगा सकता है, उन्हें गिरफ्तार करके बंद कर देता है, बलपूर्वक खिलाता है, एक वर्ष बाद उन्हें रिहा करता है और कुछ ही दिन बाद उन्हें फिर गिरफ्तार कर लेता है। यह एक विडंबना है कि जो राज्य सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम के तहत, पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर में अनगिनत बेकसूर लोगों की जान लेने में कोई संकोच नहीं दिखाता, वही राज्य सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम का विरोध करने वाली कार्यकर्ता को, ‘उसकी जान बचाने’ के बहाने, बार-बार गिरफ्तार करता है! बार-बार गिरफ़्तार और बंद किये जाने की वजह से, इरोम शर्मीला की सेहत बिगड़ती जा रही है।

यह इंसाफ और लोकतंत्र का घोर हनन है। इस मामले के असली अपराधी, एक ऐसी ज़मीर वाली महिला को अपराधी करार करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनका एक ही प्रयास है, कि लोगों के साथ किये जा रहे अपराध – पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर के सभी लोगों के खिलाफ़ राज्य व उसके सशस्त्र बलों द्वारा अनवरत उत्पीड़न और हिंसा – पर ध्यान खींचना।

56 वर्षों तक सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम जैसे कानून को लागू रखना और लगातार इस्तेमाल करना, यह हमारे लोगों के अधिकारों और आज़ादियों पर घोर हमला है। इस अधिनियम के तहत केन्द्र सरकार को यह अधिकार दिया जाता है कि वह किसी राज्य के निर्वाचित अधिकारियों से सलाह किये बिना ही, उस पूरे राज्य को “अशान्त क्षेत्र” घोषित कर सकता है। इन “अशांत क्षेत्रो” में सेना के गैर-कमीशन अफ़सरों को भी, “अपराध” की “संभावना” के शक के आधार पर ही, किसी व्यक्ति को मार डालने, यातनायें देने, घायल करने और बलपूर्वक बंदी बनाने का अधिकार दिया जाता है। इस बहाने, लोगों के खिलाफ़ सेना जो भी अपराध करती है, उसके लिये सैनिकों को कानूनी कार्यवाही या दंड से सुरक्षित रखा जाता है।
सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम के तहत अनगिनत अपराध किये गये हैं। ओइनम के गांव वासियों की हत्या, मालोम में एक बस स्टॉप पर इंतजार कर रहे दस लोगों को बंदूक की गोलियों से भून डाला जाना, जिसके बाद इरोम शर्मीला ने अपना अनशन शुरू किया था, ये मात्र कुछ उदाहरण ही हैं। 2004 में मनोरमा देवी का अपहरण, बलात्कार और हत्या, जिसके बाद मणिपुर और देश के अन्य स्थानों पर कई हफ्तों तक जन प्रतिरोध चलता रहा, एक और ऐसी भयानक घटना थी। इस कानून के चलते, प्रतिदिन नौजवानों को उठा लिया जाता है, उनसे सवाल किया जाता है या उन्हें पीटा जाता है, “काम्बिंग धावा बोलकर” घरों पर हमले किये जाते हैं, महिलाओं का बलात्कार किया जाता है और बेकसूर लोगों को “लापता” कर दिया जाता है – यह सब सैनिक और अर्धसैनिक बलों द्वारा नियमित तौर पर किया जाता है।

2004 के जन प्रतिवादों के बाद संप्रग सरकार एक जांच आयोग बिठाने को मजबूर हुई थी। जस्टिस रेड्डी कमेटी, जो इस जांच के लिये बिठाई गई थी, उसको यह मानना पड़ा कि “चाहे कारण कोई भी हो, यह अधिनियम अत्याचार का प्रतीक बन गया है, लोग इससे नफ़रत करते हैं और यह भेदभाव तथा दमन का साधन बन गया है”। इसके बावजूद सरकार ने सिर्फ इस अधिनियम की जगह “एक अधिक मानवीय अधिनियम” लाने को आश्वासन दिया था। परन्तु इतना भी नहीं किया गया है।

जब-जब सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम के खिलाफ़ लोगों का गुस्सा बढ़ जाता है तो सरकार हमेशा यह बहाना देती है कि सेना इसे रद्द करने के सख्त विरुद्ध है। परन्तु सच्चाई तो यह है कि पिछले पांच दशकों में राज करने वाली हरेक सरकार ने इसे जारी रखना चाहा है। शुरुवात में इसे असम और मणिपुर में लागू किया गया था जो 1972 में पूर्वोत्तर के सभी सातों राज्यों में और पिछले दो दशकों से जम्मू और कश्मीर में लागू किया गया। यह दिखाता है कि आम तौर हिन्दोस्तान का पूरा शासक संस्थापन “एकता व अखण्डता” को कायम रखने के लिये इसे लागू रखने पर तुला है, चाहे इन इलाकों के लोगों के विचार इसके कितने ही विरोध में क्यों न हों। यह इन इलाकों की ओर, बर्तानवी उपनिवेशवादी सोच की ही निरंतरता है। वास्तव में, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम सीधे तौर पर बर्तानवी उपनिवेशवादी शासकों द्वारा 1942 में लागू किया सशस्त्र बल विशेष अधिकार अध्यादेश ही है।

इरोम शर्मीला तथा पूर्वोत्तर राज्यों और कश्मीर की जनता और पूरे देश में अनगिनत ज़मीर वाले लोग यह मांग करते आ रहे हैं कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को फ़ौरन और बिना किसी शर्त रद्द किया जाये। यह मांग हर तरह से जायज़ है। इस प्रकार के सारे कानूनों, जो राज्य के सशस्त्र बलों को लोगों के जीने के अधिकार और मूल अधिकारों व आज़ादियों का निरंकुश हनन करने की ताकत देते हैं, ये घृणास्पद हैं और इनका हमारे समाज में कोई स्थान नहीं है। लोक राज संगठन यह मांग करता है कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम और इस प्रकार के सभी काले कानूनों को फौरन रद्द करना चाहिये। इन कानूनों के तहत, अधिकारियों द्वारा जनता पर अत्याचार के सभी मामलों की जल्दी से जल्दी जांच की जानी चाहिये और अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिये

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