लोक राज संगठन का निवेदन, १४ फ़रवरी २०१३
अफज़ल गुरु को बड़े गुप्त तरीके से ९ फरवरी को फांसी चढ़ाया गया और उनके परिवार को भी इसकी खबर पहले नहीं दी गयी. उनके मुकद्दमे के दस्तावेज तथा कई वकील एवं मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने जो कई दस्तावेज इकट्ठा किये हैं, उनसे स्पष्ट होता है कि उनका गुनाह साबित नहीं हुआ था, फिर भी राष्ट्रपति ने उनकी दया की प्रार्थना अस्वीकृत कर दी. सरकार ने एक गंदे राजनितिक मकसद से ऐसा किया है, जिसका उद्देश्य है लोगों के बीच फूट डालना एवं भ्रम पैदा करना, और लोक राज संगठन बड़े क्रोध से उसका धिक्कार करता है.

गिरफ्तार होने के समय से पूरे मुकद्दमे के दौरान अफज़ल गुरु के किसी वकील ने बचाओ नहीं किया, और इसीलिए न्यायव्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा हुआ. अब तो उन्हें दुनिया से ही उठा दिया गया है मगर संसद के ऊपर हुए हमले से संबंधित किसी भी मुख्य सवाल का कोई जवाब नहीं मिला है, जैसे कि क्या दिसंबर २००१ में संसद पर जो हमला हुआ था वह कुछ गिने चुने गुमराह व्यक्तियों की साजिश थी या कोई संगठित ताकत उसके पीछे थी? उस हमले से किसे फायदा हुआ? उस हमले के पीछे जो असली ताकते थी उनपर मुकद्दमा क्यों नहीं चलाया गया?

सच्चाई तो यह है की अफज़ल गुरु कश्मीर में आत्मसमर्पण किया हुआ एक उग्रवादी था जिसे संसद पर हुए हमले से संबंधित संदिग्ध घटनाओं में एक प्यादे की तरह इस्तेमाल किया गया. उक्त महत्वपूर्ण सवालों का आज भी कोई जवाब नहीं है. दूसरे गिलानी जैसे लोग जिन्हें इसी मुकद्दमे में फंसाया गया था उन्हें छोड़ दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ जो सबूत था वह इतना बेकाम था की अभियोगी खुद फंस जाते. अफज़ल को काफी यातनाएं दी गयीं और गुनाह स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया. मगर उनके इतने विरोधाभासी बयान थे की न्यायलय ने भी उन्हें कमजोर बताया तथा सबूत मानने से इंकार किया. मगर उन बयानों का मिडिया तथा सत्ता प्रतिष्ठानों की राजनितिक पार्टियों ने एक ऐसी कहानी बनाने में इस्तेमाल किया जिससे उस घटना की सच्चाई लोगों से छिपाई गयी एवं उस व्यक्ति पर ही लोगों का पूरा ध्यान केन्द्रित किया गया.

संसद पर हमले के बाद गत ११ वर्षों में तथा अफज़ल पर फांसी की सजा घोषित होने के बाद के गत ७ वर्षों में जो गंदे प्रचार का ढोल बजाय गया है उससे सांप्रदायिक भावनाए भड़काने का काम किया गया है. अमरीका नीत “आतंकवाद के खिलाफ जंग” के यंत्र को जारी रखने के लिए इंधन का काम किया है. इससे उन तत्वों को अपने झूठे प्रचार करने का मौका मिला है जो अल्पसंख्य जमात के लोगों एवं पाकिस्तान तथा कश्मीर के लोगों को ही हिन्दुस्थान की समस्याओं के लिए जिम्मेदार बता कर, उन्हें दुश्मन मान कर उनके खिलाफ भावना भड़काने के काम से पनपते है. कांग्रेस तथा भाजपा के नेतृत्व में बड़े राजनितिक गठबन्धनों द्वारा झूठ व कीचड उछालना, तथा आरोपों व प्रत्यारोपों से कश्मीर के लोगों तथा अल्पसंख्य मुसलमानों पर दबाव रहा कि वे अपने अधिकारों की मांग न करे. बढती मेहेंगाई, बेकारी तथा जन विरोधी आर्थिक सुधारों जैसी महत्वपूर्ण समस्याओं से लोगों का ध्यान मोड़ने के लिए हिन्दुस्थान की सरकार को एक आसान औजार मिल गया. अलग-अलग जन समुदायों तथा देश के अलग-अलग प्रदेशों के बीच जो अविश्वास पैदा हुआ, उससे सत्ता प्रतिष्ठानों की अलग-अलग राजनितिक पार्टियाँ, उनके चुनावी यंत्रों, आदि ने फायदा उठाया और डर, अविश्वास, तथा साजिश के आधार पर उन्होंने अपनी वोट बैंक बनायी.

इस मुकद्दमे में, जिस तरह तहकीकात हुई, ठोस सबूतों का अभाव, उस साजिश के पीछे की ताकतों की भूमिका को अँधेरे में रखा जाना, अफज़ल गुरु की फांसी को गुप्त रखाना – इन सभी से लगता है कि दाल में कुछ न कुछ जरूर काला है.

सच्चाई पसंद लोग जिनका विश्वास था कि अपने देश के संविधान में बुनियादी अधिकार दिए है एवं अपनी न्याय व्यवस्था तथा सुरक्षा यंत्र बड़े ही निष्पक्षपाती भूमिका अदा करते है, इस घटना से उनका विश्वास भी चूर चूर हो गया. इस घटना ने फिर एक बार साबित कर दिया की हिन्दुस्थान के नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की सुनिस्चिती अपने देश के संविधान से नहीं होती है, अपनी न्याय व्यवस्था निष्पक्षपाती नहीं है, तथा अपने सुरक्षा दल भी सत्ता प्रतिष्ठानों के हुक्म पर काम करते है, और ये सत्ता प्रतिष्ठान चाहते थे की संसद पर हमले की घटना का उपयोग खुद के स्वार्थी राजनितिक हित के लिए करे.

सत्ता पर बैठे हुए लोगों के मुखपत्र डींग मार रहे हैं कि अफज़ल गुरु की फांसी यह एक “कठोर संदेश” है. इस घटना की काली छवि पर जो सवाल उठाते है उन्हें देशद्रोही करार दिया जा रहा है. मगर यह स्पष्ट नहीं है की यह “कठोर संदेश” किसके लिए है. क्या यह संदेश, अपने राष्ट्रीय तथा राजनितिक अधिकारों के लिए संघर्ष करनेवाले कश्मीर के लोगों के लिए है? या क्या यह उन अल्पसंख्य समुदाय के लोगों के लिए है जो जीविका तथा जीवन की सुरक्षा की सुनिश्चिती की मांग करने की हिम्मत कर रहे है? या क्या यह संदेश हिन्दुस्थान के उन सभी लोगों के लिए है जो मेहेंगाई, बेकारी, आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार तथा महिलाओं के खिलाफ हिंसा के विरोध में अपनी आवाज़ उठा रहे है?

जिस क्रूरता तथा कायरता से अफज़ल गुरु को फांसी चढ़ाया गया, और उस गुनाह के पीछे जो असली ताकते हैं उन्हें छिपाए रखने के लिए जो राजनितिक छल कपट किया गया, उसका लोक राज संगठन क्रोध से धिक्कार करता है. लोक राज संगठन सभी को आह्वान करता है कि सत्ताधारीयों के इस “कठोर संदेश” को ठुकराकर, धर्म तथा दूसरे भेद बाजू रखकर अपनी राजनीतिक एकता बनाकर अपने संघर्ष के संगठन मजबूत बनाओ.

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