आप सबका का स्वागत करता हूँ . आज का टॉपिक है "अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये लोगों की समितियां बनाने की सख्त जरूरत है". मेरे क्याल में यह बहुत अहम मुद्दा है. इसके ऊपर हम सब मिलके विचार करना है।

हाल के दिनों में सरकार, प्रशासन, पुलिस और न्याय व्यवस्था के द्वारा महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की नामंजूरी के खिलाफ हजारों लोग विरोध प्रदर्शनों में सड़कों पर उतरे हैं। विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेताओं द्वारा संवेदनहीन और बेरुखी टिप्पणियों के कारण विरोध की आग और भड़क गयी है। उन्होंने अफवाहें फैलाकर इन विरोध प्रदर्शनों को खत्म करने की पूरी कोशिश की है।

दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने आरोपों का रुख बहुत जल्द यह कहते हुए मोड़ दिया कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है न कि राज्य सरकार को। गृह मंत्री शिंदे जी ने तो राजधानी में विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों से मिलने से भी इन्कार कर दिया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर आरोप लगाया कि वे पुलिस को कमज़ोर करने के लिए माओवादियों का सहयोग ले रहे हैं। उन्होंने लाठी चार्ज, आंसू गैस और पानी की तेज़ बौछार का आदेश देकर न्याय मांगने के लिए जमा हुए महिलाओं, मजदूरों, नौजवानों और छात्रों की भीड़ को दबाने की कोशिश की।

सबसे पहली सीख यह है कि हमारे देश की सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था आम जनता के लिए नहीं है बल्कि सिर्फ कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए ही है। कानून हर किसी के लिए समान रूप से लागू नहीं किया जाता है। इसलिए पुलिस से हर कामकाजी महिला को सुरक्षा देने की उम्मीद रखना बेकार है। 63 वर्ष का यह हिन्दोस्तानी गणतंत्र हमारे देश की महिलाओं और लोगों की सुरक्षा व बचाव करने में नाकाम रहा है।
यौन हमलों से निपटने के लिये दंड कानूनों (criminal laws) में संशोधनों के सुझावों के लिये पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे. एस. वर्मा के नेतृत्व में एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया है।

Justice Verma Committee has submitted its recommendations. It has suggested stricter punishment for sexual offenders. It has proposed a separate Bill of Rights for women that would supposedly entitle a woman a life of dignity and security. It has recommended a Review of the Armed Forces Special Powers Act. It has said nothing about organised sexual attacks on women during state-organised genocides and pogroms. Is it the lack of strict laws that is the problem?

गुनहगारों को सज़ा देने के लिये कानूनों की कमी नहीं है। अपने लोगों ने खुद अपनी आंखों से देखा है कि उच्च अधिकारी खुद ही महिलाओं के खिलाफ़ गुनाहों के लिये जिम्मेदार हैं और उनसे इन कानूनों को लागू करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। हिरासत में बलात्कारों के जरिये, पर्वोत्तर, कश्मीर और "अशांत क्षेत्र" या "आतंकवाद से ग्रस्त" घोषित किये अन्य क्षेत्रों में महिलाओं पर सैन्य अत्याचारों, राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक व गुटवादी हिंसा के दौरान महिलाओं के बलात्कार व हत्याओं, और सत्ताधारियों द्वारा आदिवासी, दलित व अन्य महिलाओं के खिलाफ़ नियमित बलात्कारों के ज़रिये, अनगिनत गुनाहों के लिये, directly or indirectly, सरकार और उसकी संस्थायें – प्रशासन, पुलिस, सशस्त्र बल तथा न्याय व्यवस्था जिम्मेदार हैं।

Recently Home Minister Shinde accused BJP of running terror camps and organising the Malegaon blasts. BJP has accused Congress in a similar way. Both are true. Both are the real terrorists.

1984, 1993 और 2002 में कांग्रेस पार्टी व भाजपा के किराये के गुंडों ने सैकड़ों महिलाओं का बलात्कार किया और हजारों महिलाओं व पुरुषों की हत्यायें कीं। परन्तु न तो गुनहगारों को सज़ा दी गयी और न ही कमान की जिम्मेदारी के सिद्धांत पर कोई कानून ही बनाया गया, जिसके ज़रिये कमान में बैठे लोगों को उनके गुनाहों के लिये जिम्मेदार ठहराया जा सके।

एक और अहम बात यह है की शासक वर्ग की प्रबल विचारधारा जिसके मुताबिक इस तरह के हमलों की ज़िम्मेदार खुद महिलायें हैं। इससे साफ़ जाहिर होता है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था सिद्धांत और अभ्यास दोनों में ही महिला विरोधी है। अनेक हस्तियों ने मीडिया में महिलाओं के विरोध में अत्यधिक पिछड़े और रूढ़ीवादी विचार व्यक्त किये। एक आर.एस.एस. नेता का बयान कि महिलाओं पर ऐसे हमले सिर्फ शहरी इंडिया में होते हैं, ग्रामीण भारत में नहीं – जैसी एकदम झूठी बातों का काफी प्रचार किया गया।

It is not the women who are to blame for violence on themselves. It is not the people who are communal and organise communal riots against each other. It is the ruling establishment which attacks both men and women to preserve their power and rule.

जो सत्ते में बैठे है वो चाहते हैं कि सारे लोग कानूनों को मज़बूत करने के वाद-विवाद में उलझे रहें। यह जानबूझकर लोगों को गुमराह करने का एक तरीका है। कानूनों को मजबूत करना तब तक बेकार है जब तक उनको लागू करने वाले तंत्र सिर्फ गिने-चुने विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को संरक्षण देने के लिए हों।

महिलाओं व आम लोगों की जिन्दगी, आत्मसम्मान व सुरक्षा पर हमलों में राज्य व उसकी संस्थायें, और साथ ही संसदीय राजनीतिक पार्टियों का हाथ होना, लोगों द्वारा सुरक्षा समितियां बनाने की आवश्यकता पर इशारा करता है। हमें पड़ोस, मोहल्लों, बस्तियों, स्कूलों व कॉलेजों, काम के स्थानों व गांवों में, और धार्मिक अल्पसंख्यकों व आदिवासियों सहित, निशाना बनाये गये लोगों के बीच, ऐसी समितियां बनाने की जरूरत है। हमें ऐसी समितियों की जरूरत न केवल लोगों को उनके अधिकारों व जीवन की रक्षा के लिये जरूरी है बल्कि अपने देश की राजनीतिक अजेंडा बनाने में सक्रियता से भाग लेने की भी जरूरत है। हाल के महीनों में सड़कों पर उतरे हजारों लोगों की मांगों में सबसे ठोस व शक्तिशाली मांग यही थी। सच्चाई तो यही है कि जहां भी लोग अपनी सुरक्षा संगठन बना पाये हैं, वहां वे अपने आप को सुरक्षित रख पाये हैं। 1984 के नरसंहार, गुजरात के नरसंहार और राज्य द्वारा विभिन्न लोगों पर हमलों के अपने सकारात्मक व नकारात्मक अनुभवों का यही निष्कर्ष निकलता है।

It is very important that we should let the awareness that recent campaigns against violence on women and state-organised communal and sectarian violence get dissipated and diverted. We have to channelize this awareness and anger among the people in the direction of a complete overhaul of the present political process.

देश के राजधानी क्षेत्र में गत कुछ सप्ताहों में हुये विरोध प्रदर्शनों के दौरान ऐसी समितियां बनती देखी गयी हैं जैसा कि 1984 के दौरान हुआ था। जब लोग अपनी सुरक्षा के लिये सच में संगठित होने लगते हैं तब शासक वर्ग में डर व खलबली मच जाती है, और वे लोगों की पहलकदमियों को रोकने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। इनसे शासकों की सत्ता पर इजारेदारी खत्म होती है और इनसे लोगों को संगठित हो कर अपनी सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करने का रास्ता खुल जाता है। ऐसी समितियों को बनाने और मजबूत करने में महिलाओं के संगठनों, ट्रेड यूनियनों, छात्र यूनियनों, रेसिडेंट वेल्फेयर ऐसोसियेशनों और लोगों के अन्य संगठनों को पहल लेनी चाहिये। ऐसी समितियों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि कानून का पालन होता है, लोगों की सुरक्षा व बचाव सुनिश्चित करने वाले संस्थान लोगों के प्रति जवाबदेह रहते हैं और गुनहगारों को सज़ा मिलती है।

सामूहिक आत्मरक्षा के लिए हम तुरंत कदम उठाना चाहिए। साथ-साथ हमें मौजूदा व्यवस्था एवं कानून में बुनियादी बदलाव की मांग करनी होगी और निरंतर उसके लिए लड़ना होगा। लोगों के हात में सत्ता लाने के लिए राजनीतिक व्यवस्ता का पुनर्गठन अनिवार्य है। हमें एक ऐसे आधुनिक लोकतंत्र के लिए संघर्ष करना होगा जिसमें किसी भी बहाने से कोई भी महिलाओं या पुरुषों के अधिकारों का उल्लंघन न कर सके।

I request all of you to fully participate in this important discussion and give your valuable views.
Thank you

By admin

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