हाल के दिनों में सरकार, प्रशासन, पुलिस और न्याय व्यवस्था के द्वारा महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की नामंजूरी के खिलाफ हजारों लोग विरोध प्रदर्शनों में सड़कों पर उतरे हैं। विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेताओं द्वारा संवेदनहीन और बेरुखी टिप्पणियों के कारण विरोध की आग और भड़क गयी है। उन्होंने अफवाहें फैलाकर और धारा 144 लगाकर इन विरोध प्रदर्शनों को खत्म करने की पूरी कोशिश की है। सच्चाई तो यह है कि 63 वर्ष का यह हिन्दोस्तानी गणतंत्र हमारे देश की महिलाओं और लोगों की सुरक्षा व बचाव करने में नाकाम रहा है।

यौन हमलों से निपटने के लिये दंड कानूनों में संशोधनों के सुझावों के लिये पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे. एस. वर्मा के नेतृत्व में एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। परन्तु गुनहगारों को सज़ा देने के लिये कानूनों की कमी नहीं है। अपने लोगों ने खुद अपनी आंखों से देखा है कि उच्च अधिकारी खुद ही महिलाओं के खिलाफ़ गुनाहों के लिये जिम्मेदार हैं और उनसे इन कानूनों को लागू करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। हिरासत में बलात्कारों के जरिये, पर्वोत्तर, कश्मीर और "अशांत क्षेत्र" या "आतंकवाद से ग्रस्त" घोषित किये अन्य क्षेत्रों में महिलाओं पर सैन्य अत्याचारों, राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक व गुटवादी हिंसा के दौरान महिलाओं के बलात्कार व हत्याओं, और सत्ताधारियों द्वारा आदिवासी, दलित व अन्य महिलाओं के खिलाफ़ नियमित बलात्कारों के ज़रिये, अनगिनत गुनाहों के लिये, अपनी कार्यवाइयों से या कार्यवाई न करके, सरकार और उसकी संस्थायें – प्रशासन, पुलिस, सशस्त्र बल तथा न्याय व्यवस्था जिम्मेदार हैं।

1984, 1993 और 2002 में कांग्रेस पार्टी व भाजपा के किराये के गुंडों ने सैकड़ों महिलाओं का बलात्कार किया और हजारों महिलाओं व पुरुषों की हत्यायें कीं। परन्तु न तो गुनहगारों को सज़ा दी गयी और न ही कमान की जिम्मेदारी के सिद्धांत पर कोई कानून ही बनाया गया, जिसके ज़रिये कमान में बैठे लोगों को उनके गुनाहों के लिये जिम्मेदार ठहराया जा सके।

महिलाओं व आम लोगों की जिन्दगी, आत्मसम्मान व सुरक्षा पर हमलों में राज्य व उसकी संस्थायें, और साथ ही संसदीय राजनीतिक पार्टियों का हाथ होना, लोगों द्वारा सुरक्षा समितियां बनाने की आवश्यकता पर इशारा करता है। हमें पड़ोस, मोहल्लों, बस्तियों, स्कूलों व कॉलेजों, काम के स्थानों व गांवों में, और धार्मिक अल्पसंख्यकों व आदिवासियों सहित, निशाना बनाये गये लोगों के बीच, ऐसी समितियां बनाने की जरूरत है। हमें ऐसी समितियों की जरूरत न केवल लोगों को उनके अधिकारों व जीवन की रक्षा के लिये जरूरी है बल्कि अपने देश की राजनीतिक अजेंडा बनाने में सक्रियता से भाग लेने की भी जरूरत है। हाल के महीनों में सड़कों पर उतरे हजारों लोगों की मांगों में सबसे ठोस व शक्तिशाली मांग यही थी। सच्चाई तो यही है कि जहां भी लोग अपनी सुरक्षा संगठन बना पाये हैं, वहां वे अपने आप को सुरक्षित रख पाये हैं। 1984 के नरसंहार, गुजरात के नरसंहार और राज्य द्वारा विभिन्न लोगों पर हमलों के अपने सकारात्मक व नकारात्मक अनुभवों का यही निष्कर्ष निकलता है।

देश के राजधानी क्षेत्र में गत कुछ सप्ताहों में हुये विरोध प्रदर्शनों के दौरान ऐसी समितियां बनती देखी गयी हैं जैसा कि 1984 के दौरान हुआ था। जब लोग अपनी सुरक्षा के लिये सच में संगठित होने लगते हैं तब शासक वर्ग में डर व खलबली मच जाती है, और वे लोगों की पहलकदमियों को रोकने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। इनसे शासकों की सत्ता पर इजारेदारी खत्म होती है और इनसे लोगों को संगठित हो कर अपनी सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करने का रास्ता खुल जाता है। ऐसी समितियों को बनाने और मजबूत करने में महिलाओं के संगठनों, ट्रेड यूनियनों, छात्र यूनियनों, रेसिडेंट वेल्फेयर ऐसोसियेशनों और लोगों के अन्य संगठनों को पहल लेनी चाहिये। ऐसी समितियों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि कानून का पालन होता है, लोगों की सुरक्षा व बचाव सुनिश्चित करने वाले संस्थान लोगों के प्रति जवाबदेह रहते हैं और गुनहगारों को सज़ा मिलती है।
मौजूदा परिस्थिति से आगे बढ़ने के लिये लोगों की समितियों को बनाने व मजबूत करने की जरूरत के विषय पर लोक राज संगठन, पुरोगामी महिला संगठन, आप को, 27 जनवरी के दिन एक जनसभा में भाग लेने के लिये आमंत्रित करती है।

जन सभा
समय: प्रातः 10.30 से दोपहर 4:00 बजे तक
स्थान: इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोधी रोड़, साईं बाबा मंदिर के पास, नयी दिल्ली
तिथि: रविवार, 27 जनवरी 2013
अधिक जानकारी के लिये 9818575435 पर फोन करें या lokrajsangathan@yahoo.com पर ईमेल करें या www.lokraj.org.in dks को नयी जानकारी के लिये देखें

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