२००२ में गुजरात में जो नरसंहार हुआ था उसमें अहमदाबाद के नरोड़ा पटिया इलाके में अनुमानित ९७ लोगों की ह्त्या हुई थी. उस भयानक घटना के १० वर्ष बाद विशेष अदालत ने ३१ लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा घोषित की. अदालत के उस निर्णय की विशेषता यह है की जिन्हें सज़ा दी है उनमें भाजपा के निर्वाचित विधायक तथा नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री रह चुकि माया कोडनानी भी शामिल है. १०० से ज्यादा महिला, बच्चे, तथा आदमियों की हत्या, बलात्कार करने के केवल दो महीने बाद उन्हें महिला तथा बाल कल्याण मंत्री नियुक्त किया गया था.

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त की हुई एस.आय.टी.  गुजरात नरसंहार की ९ घटनाओं की खोजबीन कर रही है. उनमें से ५ के बारे में फैसला हुआ है. अब तक हत्या करने के इल्जाम में अदालत ने ११० लोगों को १०७ हत्याओं के लिए आजीवन कारावास की सज़ा दी है.

गुनाहगारों में से बहुतों को सज़ा हुई है. एक भूतपूर्व मंत्री को भी सज़ा दी है. मगर उन नरसंहारों को संगठित करने वाले तथा उनकी अगुवाई करने वाले उनके कमांडर अब भी समाज में सर ऊँचा करके घूम रहे है. उन हिंसा से पीड़ित तथा १० साल से ज्यादा समय से न्याय के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं ने बार बार यह सच्चाई बताई है. कई जांच पड़ताल रिपोर्टों ने सबूतों के साथ यह साबित किया है की गुजरात के मुख्यमंत्री तथा कई मंत्रियों एवं गुजरात के पुलिस तथा राज्य रिज़र्व पुलिस के बड़े बड़े अधिकारी उस भयानक नरसंहार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से शामिल थे. कई उच्च पुलिस अधिकारियों ने उनके सहयोगी तथा वरिष्ठ अधिकारियों के बारे में जो बयान दिए है उनसे यही साबित होता है.

कई संगठन तथा कार्यकर्ताओं ने, जिनमें लोक राज संगठन भी शामिल है, बार बार यह माँग की है कि १९८४, १९९२-९३, तथा २००२ सहित, उन सभी जातिवादी हिंसा की वारदातों के लिए जिम्मेदार गुनाहगारों को कड़ी सजा होनी चाहिए. १९८४ के नरसंहार, जिसमें केवल दिल्ली शहर में ही ३००० से ज्यादा सिखों को मार डाला था, इनको संगठित करने वाले अधिकार के स्थान पर मौजूद केन्द्रीय गृहमंत्रालय, दिल्ली शहर के अधिकारी, या सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के किसी को भी आज तक सजा नहीं दी गयी है. दिसंबर १९९२ में बाबरी मस्जिद को गिराने के बाद जो हत्याकांड हुआ था उसके बारे में भी ऐसा ही हुआ है. उस वक्त केन्द्र सरकार में कांग्रेस तथा उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता पर थी यह ध्यान में रखना चाहिए. नरोड़ा पटिया के बारे में जो निर्णय अदालत ने दिया है वह उन सभी संगठन तथा कार्यकर्ताओं के लिए उत्साहजनक है जो इतने वर्षों से बड़े ही धीरज से न्याय के लिए संघर्ष कर रहे है.

केन्द्र सरकार कई वर्षों से यह वादा कर रही है की वह संसद के सामने एक ऐसा विधेयक पेश करेगा जिसका उद्देश होगा, इस तरह का कानून बनाना ताकि जातिवादी हिंसा कभी ना हो. सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण (न्याय तक पहुंच और हानिपूर्ती) विधेयक २०११ के ड्राफ्ट को राष्ट्रीय सलाहगार परिषद ने तैयार किया है. यह ड्राफ्ट जातिवादी हत्या पर निर्बंध लायेगा ऐसा बताया जा रहा है, मगर सच्चाई तो यह है की मानवता के खिलाफ इतने भयानक गुनाह करनेवालों को सजा दी जा सके इसके लिए जरूरी प्रभावशाली कोई तंत्र उस विधेयक में नहीं है! अगर गुनाहगारों को यह पता है की उन्हें गुनाह के लिए कभी सज़ा नहीं हो सकती तो फिर संगठित गुनाहों को कैसे रोका जा सकता है?

भविष्य में अपने देश के किसी भी तबके के लोगों के खिलाफ इस तरह के गुनाह ना हो इसकी सुनिश्चिती करने के लिए किस तरह का कानून बनाया जाय, किन तत्वों के आधार पर यह कानून बनाया जाय, यह सवाल है?

कोई भी निष्पक्ष विवेचक यह सच्चाई मानेगा की १९४७ से अब तक अपने लोगों का अनुभव है की जातिवादी तथा साम्प्रदायिक भावना भड़काना, किसी विशेष धर्म के या राष्ट्रिय अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का आयोजन करना, यह अलग अलग राजकीय पार्टियों की पसंदीदा राजनितिक रणनीति रही है. संसद में मौजूद पार्टीयों ने सत्ता में बने रहने के लिए या तो फिर सत्ता में आने के लिए साम्प्रदायिक हिंस का आयोजन किया है.

गंभीरतासे विश्लेषण करने वाले यह भी मानेंगे की जातिवादी तथा साम्प्रदायिक हिंसा के आयोजन करने से यथास्थिती कायम रहती है. उस तरह की हिंसा से आम लोगों के बीच फूट पड़ती है तथा वे दिशाभ्रमित रहते है, जिससे सत्ताधारी वर्गों को फायदा होता है. भावनाओं से भड़क कर या सुरक्षा के बारे में चिंतित होकर अधिकारियों के खिलाफ अपनी समान शिकायतों से लोगों का ध्यान हटता है. उनका गुस्सा एक दूसरे के खिलाफ भड़कता है. इस तरह जातिवादी तनाव तथा साम्प्रदायिक विवाद दोनों से सत्ता पर बैठे लोगों को मदद मिलती है ताकि आम जनता जो राजनितिक सत्ता से किनारे कर दिये गये हैं, वो किनारे पर ही रहें.

हर बड़ी जातिवादी घटनाओं के बाद प्रमुख अधिकृत प्रचार यही होता है की इस या उस जाति के या समुदाय के लोग उन गुनाहों के लिए जिम्मेदार थे. सरकार द्वारा नियुक्त जाँच आयोग और कभी कभी अदालते भी उस प्रचार का समर्थन करते है. उन गुनाहों को संगठित करने के पीछे राजनितिक पार्टियों के नेताओं की जो प्रमुख भूमिका होती है उसे तथा राज्य की मशीनरी के प्रमुख अधिकारियों की मिलीभगत हमेशा ही छुपाई जाती है. सच्चाई को उल्टा किया जाता है. नरसंहार को दंगा-फसाद कहा जाता है. जो उस हिंसा से पीड़ित है उन्ही को जातिवादी करार दिया जाता है जब की अधिकारियों के बारे में कहा जाता है की वे मुक्तिदाता है जो “सांप्रदायिक शांति” प्रस्थापित करेंगे.

सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम करने वाला कानून तभी विश्वसनीय हो सकता है जब वह इस सिद्धांतपर आधारित हो की समाज के सभी की, बिना किसी अपवाद के, रक्षा करने की जिम्मेदारी राज्य की है. इसका मतलब है कि जो अधिकारी हैं, उन्हें आलाकमान बतौर जिम्मेदारी लेनी होगी अगर वे जिन्दगी बचाने में नाकामयाब होते हैं.

नरोड़ा पटिया में सांप्रदायिक नरसंहार करने वाले ऐसा नहीं कर सकते थे अगर उन्हें ऊंचे ओहदे के बड़े अधिकारियों की मदद तथा संरक्षण नहीं होता था. १९८४ में मतदाताओं की सूचि पर कुलनाम के आधार पर सिखों के घरों पर निशानी लगायी गई और वह सूचि नरसंहार आयोजित करने वालों को दी गयी थी तथा पार्टी मशीनरी के जरिये आगजनी एवं हत्या का सामान दिया गया था. २००२ में गुजरात में हत्यारों तथा लुटेरों को सत्ताधारी पार्टी की मदद से मुसलमानों के घर का पता दिया गया. अपने देश के अलग अलग इलाकों में राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा के दौरान हमेशा ऐसा हुआ है.

सांप्रदायिक हिंसा यह लोगों तथा उनकी एकता के खिलाफ एक गंभीर राजनितिक गुनाह है. इसे, एक या अनेक व्यक्तियों द्वारा मिलकर किया कोई साधारण गुनाह नहीं समझा जा सकता है जिसकी जाँच साधारण क़ानूनी प्रक्रिया के मुताबिक हो और जिसके लिए प्रत्यक्षदर्शियों ने दर्ज किये प्रथम शिकायत बयान जरूरी हों. राजनीतिक गुनाहों के लिए राजनितिक पार्टियों और खासकर उनके प्रमुख नेताओं को जिम्मेदार ठहराना चाहिए, ना की सिर्फ उन भाड़े के गुंडों को जो हिंसा करते है. “आलाकमान की जिम्मेदारी” के सिद्धांत का मतलब है की व्यवस्थापन तथा पुलिस के सर्वोच्च अधिकारीयों, प्रभारी प्रशासनिक तथा राजनितिक अधिकारीयों को जिम्मेदार ठहराना चाहिए. किसी को भी इससे छुटकारा नहीं मिलना चाहिए, चाहे वह कितने ही ऊँचे ओहदे पर क्यों ना हो!

नरोड़ा पटिया का फैसला एक महत्वपूर्ण अग्रगामी कदम है क्योंकि यह दिखता है कि एकता से तथा दृढ़ अनवरत संघर्ष से कुछ नतीजा हासिल हो सकता है हालाँकि आंशिक न्याय ही क्यों न हो. अब चुनौती यह है कि इस जीत को और आगे कैसे ले जाय, सभी पीड़ित व्यक्तियों को सम्पूर्ण न्याय की ओर, और एक ऐसे कानून की ओर जो सांप्रदायिक हिंसा को राजनीतिक गुनाह मानेगा और आम जनता के जीवन की सुरक्षा करने में नाकामयाबी के लिए आलाकमान को जिम्मेदार ठहराएगा.

यह संघर्ष, राजनितिक सत्ता लोगों के हाथों में आने के लिए जारी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण भाग है. जब हम, आम लोगों, के हाथों में सत्ता होगी, तभी हम सांप्रदायिक हिंसा की इस महामारी से हमेशा हमेशा के लिए मुक्ति पाएंगे, क्योंकि हम गुनाह्गारों को ऐसी कड़ी सजा देंगे की कोई भी पार्टी या गुट इस तरह के गुनाह संगठित करने की हिम्मत कभी नहीं करेगा.

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