0120827_lrs_mtg_004.jpgपूर्वोत्तर के लोगों के साथ राज्य के द्वारा फैलाये जा रहे आतंक के खिलाफ़ और उनके अधिकारों की हिफाज़त में, लोक राज संगठन ने ‘पूर्वोत्तर के लोगों की असुरक्षा के लिए कौन जिम्मेदार?’ विषय पर नई दिल्ली में 27 अगस्त, 2012 को सार्वजनिक सभा का आयोजन किया।

इस सभा में, मणिपुरी स्टूडेंट एसोसियेशन दिल्ली, जमात ए इस्लामी हिन्द, पीपल्स फ्रंट के प्रतिनिधियों के अलावा, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, स्कूलों-कालेजों के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।

लोक राज संगठन की तरफ से सभी सहभागियों का स्वागत करते हुये श्री बिरजू नायक ने सभी के दिमाग के प्रश्न को सामने रखा कि आज पूर्वोत्तर के लोगों पर हमले क्यों हो रहे हैं और इनसे किस को फायदा हो रहा है। उन्होंने सुचरिता को आमंत्रित किया कि वे लोक राज संगठन की दिल्ली इलाका परिषद की ओर से विचार-विमर्श की शुरुआत करें। सभा का आयोजन अल्प सूचना से होने के और बार-बार बारिश होने के बावजूद, हिन्दी भवन का सभागृह भरा हुआ था।

सुचरिता ने सवाल उठाया कि इतने दिनों तक केन्द्र सरकार ने एस.एम.एस. के ज़रिये पूर्वोत्तर के लोगों को भेजी जा रही नस्ली धमकियों के स्रोत को क्यों नहीं पहचाना और अंत में घोषणा कर दी कि ये एस.एम.एस. पाकिस्तान से आये हैं! अधिकारियों ने लोगों के बीच डर और चिंता के निवारण के लिये कोई कदम नहीं लिये, परन्तु खौफ भड़काने के लिये, उन्हें घर भेजने के लिये विशेष रेलगाडि़यां जरूर चलाईं। हमारे शासक “राष्ट्रीय सुरक्षा“ की बात करने से थकते नहीं हैं जबकि वे करोड़ों लोगों को न्यूनतम सुरक्षा भी नहीं देते हैं। विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेता जो संसद में “पूर्वोत्तर के अपने बहनों और भाईयों“ के लिये मगरमच्छ के आंसू बहाते हैं, वहीं साथ मिल कर सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए.) को जारी रखने की मांग करते हैं, जिसके तहत यहां के लोगों पर दैनिक तौर पर अवर्णननीय जुल्म और अत्याचार होता है, जबकि पूर्वोत्तर के सभी लोग इस काले कानून को रद्द करने और सेना को वापस भेजने के लिये एक होकर मांग करते आये हैं। मानवता और न्यायप्रिय सभी लोगों को उन्होंने आह्वान दिया कि समाज में धर्म, जात, नस्ल, राष्ट्रीय मूल या किसी और आधार पर भेदभाव के बिना, सभी सदस्यों के अधिकारों की सुरक्षा के लिये अपनी आवाज़ बुलंद करें।

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सुचरिता ने कहा कि आज केन्द्र और राज्य सरकार और मीडिया जानबूझकर पूर्वोत्तर के लोगों में डर और आतंक का माहौल बना रही है। पुणे, बैंगलोर, हैदराबाद, मुम्बई, चैन्नई आदि मुख्य शहरों में पढ़ने व काम करने वाले पूर्वोत्तर के लोगों के साथ जो हो रहा है, उसे सारी मीडिया यह प्रचार कर रही है कि दक्षिणी असम के कोकराझार में हुई सांप्रदायिक नरसंहार की “प्रतिक्रिया” है। यह सरासर झूठ है। यह उस बात को छिपाने की कोशिश है कि असम में हुए नरसंहार के पीछे किसका हाथ है और बाकी देश में उत्तर पूर्व के लोगों की असुरक्षा के लिए कौन जिम्मेदार है।

सुचरिता ने कहा कि उत्तर पूर्व एक विशाल इलाका है जहां कई राष्ट्र और जनजातियां रहती हैं। ये लोग अनेक भाषाएं, विभिन्न सांस्कृति और अनेक धर्म को मानते हैं। इन विभिन्न लोगों को एक बात जोड़ती है। यह बात है उनके हालात। पूरे इलाका आजादी के बाद केन्द्रीय राज्य की लूट की उपनिवेशवादी नीति का शिकार है। ज्यादातर इलाका लगातार फौजी हुकूमत के दबदबा में है। यहां के लोगों को तथाकथित देश की एकता और अखंडता का दुश्मन माना जाता है। फौजियों द्वारा उनका कत्ल, बलात्कार करना, उत्पीडि़न, सशस्त्रबल विशेष अधिकार कानून के तहत इसे उचित माना जाता है। मनोरमा देवी के बलात्कार और कत्ल के बाद पूरा मणिपुर सशस्त्रबल विशेष अधिकार कानून के खिलाफ़ उठा खड़ा हुआ। लोक राज संगठन ने पूरे देश में सशस्त्रबल विशेष अधिकार कानून के खिलाफ़ अभियान चलाया। इस अभियान के तहत देश के लोगों को समझ में आया कि उत्तर पूर्व के लोग तथा खासतौर पर मणिपुर के लोगों को क्या-क्या बर्दाश्त करना पड़ता है। लेकिन अभी तक केन्द्रीय सरकार ने इस फासीवादी कानून को रद्द नहीं किया है।

सुचरिता ने बताया कि बाकी हिन्दोस्तान में कई दशकों से उत्तर पूर्व के लोगों के खिलाफ़ राज्य ने नस्लवादी प्रचार किया है। उन्हें ”चीनी“ कहा जाता है और “राष्ट्रद्रोही”। ठीक उसी तरह जैसे हिन्दोस्तान के मुसलमानों के खिलाफ़ उनके धर्म के आधार पर प्रचार किया जाता है और उन्हें “पाकिस्तानी”, “बांग्लादेशी“ तथा “आतंकवादी“ करार दिया जाता है। दिल्ली और अन्य जगहों में उत्तर पूर्व के लोग अत्याचार का लगातार शिकार रहे हैं। यहां की लड़कियों पर हर किस्म का हमला होता है जिसे सरकार सही ठहराने की कोशिश करती है।

सुचरिता ने बताया कि उत्तर पूर्व में राज्य की सोची-समझी नीति रही है कि लोगों को आपस में बांटकर एक दूसरे के खिलाफ़ उकसाया जाये। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाकर उन्होंने लगातार इस दिशा में प्रचार किया है ताकि लोग एक दूसरे के खिलाफ़ भड़कें। असम और कई और इलाके में यह प्रचार किया गया है कि उनकी समस्या की जड़ “बांग्लादेशी“ है। कुछ महीने पहले हमने देखा कि मणिपुर में राज्य चुपचाप देखते रहा जबकि कुछ गुटों ने राज्य की सड़कों पर ब्लोकेड करवाया। इससे लोगों को दवाइयां, दूध, गैस सिलेंडर, पेट्रोल आदि से वंचित रहना पड़ा। पीछे यह प्रचार किया गया कि दो समुदाय इसके लिए जिम्मेदार है।

सुचरिता ने बताया कि उत्तर पूर्व के लोगों की असुरक्षा के लिए केन्द्र सरकार जिम्मेदार है। नई दिल्ली के इस साम्राज्यवादी शासन को चुनौती देनी पड़ेगी और दी जा रही है। न केवल उत्तर पूर्व के लोग बल्कि पूरे देश के लोग इसको चुनौती दे रहे हैं। हमारे देश के लोग इस संघर्ष में जुड़े हुए हैं कि फैसले लेने का अधिकार लोगों के हाथ में हो जो कि आज की प्रणाली में नहीं है। देश के तमाम लोग चाहते हैं कि सबका बराबर हक हो जो कि आज की प्रणाली में नहीं है। इसलिए लोक राज संगठन प्रभुसत्ता को लोगों के हाथ में लाने के संघर्ष में जुटा हुआ है। तभी हम सुनिश्चित कर सकते हैं कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय को धर्म, जाति, नस्ल, भाषा, इलाके आदि के आधार पर दबाया नहीं जा सकता है।

लोक राज संगठन के अध्यक्ष श्री एस. राघवन ने ध्यान दिलाया कि जिन पत्रकारों ने बोडो प्रशासित इलाके में पास-पड़ोस के मुसलमान व बोडो गांवों का दौरा किया था, उन्हें दोनों समुदायों के गांव वालों ने स्पष्ट रूप से बताया कि उन पर हमला करने वाले सशस्त्र गुट, सबके सब बाहर के थे। वे पड़ोस के इलाके के नहीं थे। उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा के 1984 और 2002 के अनुभव का हवाला देते हुये बताया कि किसी एक खास धर्म या सम्प्रदाय के लोगों को निशाना बनाने के लिये वोटिंग लिस्टों का इस्तेमाल किया गया था। इस बार जो एस.एम.एस. भेजे गये थे वे सिर्फ निशाना बनाये गये पूर्वोत्तर के लोगों को भेजे गये थे। इससे पता चलता है कि इसका आयोजन करने वालों के पास यह सूचना उपलब्ध थी। भाजपा के नेता अरुण जेटली का दावा, कि असम में 60 प्रतिशत लोग ”विदेशी“ हैं, का खंडन करते हुये उन्होंने कहा कि बंगाली मुसलमानों को बंग्लादेशी नहीं समझा जा सकता है। 80 के दशक में राजीव गांधी ने असम समझौते पर दस्तखत किये थे जिसके अनुसार जो भी 1970 के पहले आया था उसको हिन्दोस्तानी नागरिकता दी जाने वाली थी। इसको लागू न करना दिखाता है कि हमारे शासकों का समस्या का समाधान करने का लक्ष्य नहीं है बल्कि फूट डाल कर राज करने के लिये इसे बार-बार इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने कहा कि जब तक लोग अपने हाथों में सत्ता नहीं लेते हैं, तब तक सांप्रदायिक हिंसा का खतरा बरकरार रहेगा।

जमात-ए-इस्लामी हिन्द के श्री इंतजार नईम ने असम में लाखों लोगों को शरणार्थी शिवरों में अमानुषिक परिस्थिति में रहने के लिये बाध्य किये जाने पर ध्यान खींचा, जहां पर सरकार की सहायता न के बराबर है। उन्होंने मुसलमान गुटों और पाकिस्तान को पूर्वोत्तर के लोगों के बीच आतंक फैलाने के लिये जिम्मेदार ठहराने के झूठे आरोपों की निंदा की। उन्होंने घोषणा की कि यह राज्य की जिम्मेदारी है कि लोगों की, देश के हर हिस्से में रक्षा करे और लोगों के कहीं भी रहने और काम करने के अधिकार की रक्षा करे।

मणिपुर स्टूडेंट एसोसियेशन दिल्ली के जॉनसन ने लोक राज संगठन के प्रति मौजूदा तनावपूर्ण परिस्थिति में एक बहुत ही समयोचित सभा आयोजित करने के लिये आभार प्रकट किया। उन्होंने सभी सहभागियों को एक साथ आकर पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति समर्थन देने के लिये धन्यवाद दिया। उन्होंने केन्द्रीय सत्ता द्वारा मणिपुरी व दूसरे पूर्वोत्तर के लोगों को हिन्दोस्तान की एकता और अखण्डता के लिये खतरनाक अन्य-देशियों के जैसे दर्शाने की कड़ी निंदा की। उन्होंने बताया कि विवाद पूर्वोत्तर के लोगों के बीच नहीं है बल्कि एक तरफ राज्य और दूसरी तरफ सभी लोगों के बीच है।

पीपुल्स फ्रंट के कॉमरेड नरेंदर ने कहा कि इस युग में, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद ने सभी राष्ट्रीय सीमायें तोड़ दी हैं। वे चाहते हैं कि सभी लोगों व इलाकों के श्रम व संसाधनों का शोषण करने की उन्हें छूट हो। इस लूटपाट के उनके रास्ते में जो भी आता है, उस पर, एक या दूसरे बहाने, वे हमला करते हैं।

आजादी बचाओ आंदोलन के प्रो. वीपी श्रीवास्तव ने कहा कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून, जो एक काला कानून है, उसे खत्म करने की मांग को लेकर बीते 10 साल से इरोम शर्मिला भूख हड़ताल पर है। उन्होंने प्रस्ताव किया कि सभी संगठनों को मिलकर एक दिन का उपवास हमें दिल्ली में करना चाहिए। इससे उन सभी के प्रति, जो इस काले कानून के खिलाफ़ बलिदान दिये हैं, सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

दूसरे वक्ताओं ने पूर्वोत्तर में राष्ट्रीय दमन और मानव अधिकारों के हनन के लम्बे इतिहास की बात की और ए.एफ.एस.पी.ए. को तुरंत रद्द करने की मांग दोहराई।

सभा का समापन निम्नलिखित प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित करने के साथ हुआ:

नयी दिल्ली में 27 अगस्त, 2012 को सम्पन्न हुयी लोक राज संगठन की सभा हिन्दोस्तानी राज्य और उसकी एजेंसियों की कड़ी निंदा करती है जो देश के विभिन्न इलाकों में पूर्वोत्तर के लोगों के बीच आतंक और असुरक्षा के लिये जिम्मेदार हैं। पूर्वोत्तर के लोगों के लिये आतंक और असुरक्षा का कारण हिन्दोस्तानी राज्य की उपनिवेशवादी नीति है जिसके अनुसार इस इलाके के लोगों को “देश की एकता और अखण्डता के लिये खतरा“ माना जाता है और उनके राष्ट्रीय, लोकतांत्रिक व मानव अधिकारों को निर्दयता से कुचला जाता है।

नयी दिल्ली में 27 अगस्त, 2012 को सम्पन्न हुयी लोक राज संगठन की सभा, सभी आज़ादी और न्याय पसंद लोगों को आह्वान देती है कि राजकीय आतंक से पीडि़त सभी लोगों की रक्षा के लिये, “एक पर हमला सब पर हमला“ के नारे तले एकजुट हों और लोगों के हाथों में राजनीतिक सत्ता देने के संघर्ष को आगे ले चलें, ताकि हम अधिकांश लोगों के हित में फैसले लेने में सक्षम हों, और सभी नागरिकों के राष्ट्रीय, लोकतांत्रिक व मानव अधिकारों की गारंटी के लिये जरूरी तंत्र बना सकें।

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