15_august_s.jpg15 अगस्त, 2012 को आजादी के 65 साल पूरा हो गया। इस उपलक्ष्य में संजय कालोनी लोक राज समिति ने आजादी पर एक नुक्कड़ सभा आयोजित किया। समिति के अध्यक्ष अशोक गुप्ता ने सभा का संचालन किया।

इस सभा को कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के साथी ने संबोधित करते हुये बताया कि हिन्दोस्तान की आज़ादी सिर्फ हमारे देश के बड़े पूंजीपतियों की आजादी है। वह जितना चाहें मजदूरों और किसानों का शोषण कर सकते हैं और अपने मुनाफे बना सकते हैं। देश की नीति निर्धारण से लेकर न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधि पालिका, ससंद आदि संस्थान उनके हित के लिये चलाये जाते हैं। जब हमारे पड़ोसी देशों पर अमरीकी साम्राज्यवाद हमला करता है तो हमारा देश मूख दर्शक बनकर देखता है। इन 65 सालों में राष्ट्रीयता का अधिकार मांगने वाले लोगों को हिन्दोस्तानी राज्य उग्रवादी-आतंकवादी या माओवादी के नाम पर कुचलती है। दूसरी तरफ जब रूस में क्रांति हुई तो बोल्सेविक पार्टी ने सोवियत संघ की स्थापना की और सभी राष्ट्रों को राष्ट्रीयता के साथ-साथ उनको अलग होने का भी अधिकार था। उस देश में पैदा होने वाले बच्चों को देश का भविष्य माना जाता था उनको हर तरह की सुविधा राज्य द्वारा दी जाती थी, और यहां पर बच्चों को बोझ समझा जाता है। अंत में बताया कि यह सब अधिकार तभी लोगों को मिलेंगे जब हिन्दोस्तान की राज्य सत्ता सरमायदार से छीन कर मजदूर मेहनतकशों को अपने हाथों में लेना होगा।

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लोक राज समिति की महिला लिडर मीरा देवी ने बताया कि यह कैसी आज़ादी है?, जहां लोगों को कोई सुरक्षा नहीं है, प्रत्येक दिन महिलाओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ की खबरें आम बात हैं। दूसरा हमारी कालोनी में लोक राज समिति कई सालों से महिलाओं के लिये शौच व्यवस्था की मांग कर रही है। हमारी कालोनी की मां-बहनों और बेटियों को खुले में शौच करने पर मजबूर होना पड़ता है। जिसकी वजह से उन्हें प्रत्येक दिन शर्मसार होना पड़ता है। हमें छोटी-छोटी मूलभूत अधिकारों के लिये भी हमें हाथ फैलाना पड़ता है। हमें एकजुट होकर अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिये संघर्ष करना होगा।

समिति के साथी बह्मदेव ने बताया कि हमें एक ऐसे हिन्दोस्तान की रचना करनी होगी, जहां स्वेच्छा पर अधारित संघ हो, जहां फैसला लेने का अधिकार मजदूरों-किसानों और मेहनतकशों के हाथ में हो।

लोक राज समिति के सचिव ने सभा को संबोधित करते हुये बताया कि हमारे देश में राजनीतिक पार्टियों की भूमिका सिर्फ अपने वोट बैंक को सुनिश्चित करने में लगी रहती है।

1947 से पहले जैसे अंग्रेज हमें जात, धर्म के नाम पर बांटकर राज करते थे, ठीक उसी तरह आज की संसदीय पार्टियां हमें पार्टियों के नाम पर बांट रखा है, ताकि हम अपने मुख्य लक्ष्य राज सत्ताा तक न पहुंच पायें। हमें चुनाव में हमें अपने बीच से उम्मीदवार चयन करने, जाने का अधिकार होना चाहिये। जनप्रतिनिधियों को जनता के प्रति जवाब देह बनाना, और कानून प्रस्ताव करने या रद्द करने का अधिकार, लोगों को अपने हाथों में लेना होगा। इस देश में हमारा भविष्य कैसा होगा यह फैसला हमारे देश के असली आधार मजदूरों-किसानों, औरत और नौजवान करेंगे, यह फैसला कोई और नहीं कर सकता।

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