माल व जन परिवहन के लिये इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल पदार्थ आवश्यक वस्तुयें हैं, जो उचित कींमतों पर उपलब्ध होनी चाहिये।
लोक राज संगठन का बयान, 30 मई 2012

पेट्रोल की कींमतों में प्रति लिटर 7.50 रु, की जबरदस्त वृध्दि कर के संप्रग सरकार ने आम आदमी पर भारी बोझ डाला है। 10 वर्षों में यह सबसे बड़ी वृध्दि है। इससे न केवल परिवहन व रोज़ाना आने जाने के खर्चे में वृध्दि होगी, बल्कि इससे आम तौर पर, सभी जरूरी वस्तुओं व सेवाओं की कींमतों में वृध्दि होगी। सरकार निकट भविष्य में डीज़ल, मिट्टी के तेल, सी.एन.जी. और एल.एन.जी. की कींमतों में वृध्दि करने की भी योजना बना रही है, जिससे आम आदमी निश्चित रूप से कगार पर धकेल दिया जायेगा।

कींमतों में वृध्दि का क्या औचित्य है? यह किसके हित में किया जा रहा है?

पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्री जयपाल रेव्ी ने सफाई दी है कि ”अगर डालर के मुकाबले रुपये में गिरावट आती है तो तेल क्रय विक्रय कंपनियों (ओ.एम.सी.) को वार्षिक 8,000 करोड़ रुपयों का घाटा होता है।” परन्तु वे यह कहना भूल गये कि रुपये के अवमूल्यन के साथ साथ कच्चे तेल का दाम भी गिरता आ रहा है। इंडियन ऑयल निगम (आय.ओ.सी.) के अध्यक्ष, आर. एस. बुतोला ने माना है कि अंतर्राष्ट्रीय बजार में कच्चे तेल की कींमत में हर एक डॉलर की गिरावट से पेट्रोल पदार्थो की कींमतों में 33 पैसे की गिरावट आती है। पिछले कुछ सप्ताहों में तेल की अंतर्राष्ट्रीय कींमतों में 10 डॉलरों से भी ज्यादा की गिरावट आयी है।

अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कींमत करीब 91 डॉलर प्रति बैरल चल रही है। अगर हम एक बैरल में 159 लिटर ले कर चलते हैं तो कच्चे तेल का दाम 31.50 रुपये प्रति लिटर पडता है। कच्चे तेल को शुध्द करके पेट्रोल के उत्पादन में करीब 5.50 रुपये प्रति लिटर का खर्चा आता है। अंत में, उत्पादन का खर्च करीब 37 रुपये प्रति लिटर होना चाहिये। अगर हम कच्चे तेल के मालवाहन में थोड़ा चढ़ाव भी मानें, फिर भी पेट्रोल के बिक्री की कींमत करीब 75 रुपये प्रति लिटर होने से, करों के जरिये, सरकार की जबरदस्त कमाई होती है। इन करों का एक भाग सरकार तेल की इजारेदार कंपनियों को देती है ताकि वे एक तंदरुस्त पक्का चिट्ठा (बैलेंस शीट) दिखा सकें!

हिन्दुस्तान टाईम्स के एक लेख में यह दिखाया गया है कि जब कोई उपभोक्ता दिल्ली में एक लिटर पेट्रोल खरीदता है, तब केन्द्र की 14.78 रु. और राज्य सरकार की 12.20 रु. कमाई होती है!

नवीनतम आंकड़ों के अनुसार 2010-11 में केन्द्र और राज्य सरकारों ने हमारे द्वारा खरीदे पेट्रोल पदार्थों से 1,02,825 करोड़ रु. का कर वसूला!
इस क्षेत्र को कुल मिला कर 1,36,497 करोड़ रु. की आमदनी हुयी, याने कि केन्द्र द्वारा पूरी की पूरी कर-वसूली, तेल कंपनियों के निगमी आयकर, लाभांश, कच्चे तेल पर राज्यशुल्क तथा अन्य राजस्वों का 17 प्रतिशत।

इस आमदनी का करीब आधा हिस्सा तेल कंपनियों को वापिस दे दिया गया ताकि वे अपने घाटे को पाट कर मुनाफे में रहें! इसकी वजह से इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आय.ओ.सी.), हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एच.पी.सी.एल.), तथा भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बी.पी.सी.एल.) मुनाफे दिखा सकी हैं।

अत:, जबकि सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर ऊंचे करों से आम आदमी को लूट रही है, वह इस आमदनी के एक अंश से इन कंपनियों के पक्के चिट्ठे को घाटे से बचा रही है। सरकार ऐसी बाज़ीगरी क्यों कर रही है? पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेव्ी ने बताया कि, ”विश्व स्तर पर, इन कंपनियों को विश्वसनीय कंपनियों, याने कि विश्व की 500 सबसे प्रमुख कंपनियों में गिना जाता है और हम इनकी छवि पर किसी भी हालत में आंच नहीं आने दे सकते हैं!

नतीजन इन तीन तेल कंपनियों का 2009-10 और 2010-11 में करों के पश्चात लाभ, क्रमश: 13,050 करोड़ और 10,531 करोड़ रुपये था।

इस सबसे दिखता है कि कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कींमतों में वृध्दि तथा इजारेदार तेल कंपनियों की भरपायी का बहाना ले कर, सरकार और इजारेदार तेल कंपनियां जबरदस्त मुनाफा कमा रही हैं। सरकार ने दो साल पहले ठीक इसीलिये इजारेदार तेल कंपनियों के हित में तेल की कींमतों को नियंत्रण से बाहर हटाया था।

पेट्रोल कींमतों की वृध्दि और आने वाली डीज़ल व गैस की वृध्दि सरकार के उन कदमों के हिस्से हैं जो सरकार आर्थिक सुधारों को आगे धकेलने के लिये और ”निवेशकों के मनोभाव” को बेहतर बनाने के लिये ले रही है। ये ”निवेशक” हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार हैं जो हिन्दोस्तानी सरकार से मांग कर रहे हैं कि वह हिन्दोस्तानी बाजार में मुनाफे बनाने की संभावना को सुधारने के कदम ले।

लोक राज संगठन सरकार और तेल इजारेदार कंपनियों के झूठ और छल की कड़ी निंदा करता है जिसके द्वारा लोगों पर मंहगाई थोपी जा रही है।

हम मांग करते हैं कि कींमतों में वृध्दि तुरंत वापिस ली जाये। हम मांग करते हैं कि सरकार इंधन जैसी जरूरी वस्तुओं को उचित दामों पर उपलब्ध करने की अपनी जिम्मेंदारी पूरी करे। लोक राज संगठन मांग करता है कि इजारेदार तेल कंपनियों को अपने आप कींमतें निर्धारित करने की छूट नहीं दी जाये।

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