लोक राज संगठन के अध्यक्ष का ब्लॉग: कर्ज का बोझ किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर रहा है!

कुछ मुट्ठीभर औद्योगिक घराने जैसे किंगफिशर, रुईया, वेदांता और डी.एल.एफ. पर बैंकों का लाखों करोड़ो रुपये का कजऱ्ा है। जब वे इस कर्ज को वापस देने से चूक जाते हैं तो उनके कर्जों के भुगतान की “शर्तों को बदलने” की इजाजत दी जाती है। अगर वे खुद को दिवालिया घोषित करते हैं तो उनके कर्ज को पूरी तरह से माफ़ भी कर दिया जाता है। बिज़नस टुडे में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों द्वारा दिए गए 63 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में से 10 लाख करोड़ की पूँजी को “स्ट्रेस्ड पूँजी” (जिसके चुकाये जाने की बेहद कम उम्मीद) है, जो ऐसे लोगों को दिया गया है, जो पहले से लिया हुआ कर्ज वापस नहीं कर रहे है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, दिसम्बर 2014 के अंत तक नॉन-परफोर्मिंग एडवांस के 647 मामले दाखिल किये गए है जिनकी कुल राशि 4,52,940 करोड़ रुपये आंकी जा रही है। यह व्यापारी घराने सज़ा से बचने के लिए अपने धन और अदालत में अपने रुतबे का इस्तेमाल करते है। प्रतिष्ठा, प्रतिबद्धता और देशप्रेम यह सब उनके लिए केवल मुनाफे कमाने का जरिया है।

एक ओर तो कर्जा न चुकाने की वजह से बैंकों के दबाव के चलते हजारों किसानों ने आत्महत्या की है। इन किसानों द्वारा लिया गया कर्ज बड़े औद्योगिक घरानों के कर्ज का बेहद नगण्य अंश मात्र है। किसानों द्वारा कर्ज न चुकाए जाने के कई जायज कारण है, जबकि उद्योग जगत के “कैप्टेन” कहे जाने वालों द्वारा कर्ज वापस न करने का कोई औचित्य नहीं है। खराब मानसून, फसलों की बर्बादी, कृषि उत्पादों के कम दाम, खेती में लगने वाले सामान की ऊँची कीमत, कृषि व्यापार में इजारेदारी, इन कारणों की वजह से किसान कई बार कर्ज वापस करने में असमर्थ होता है। लेकिन खुद को गबन करने वाला कहलाये जाने की बजाय, वह अपना सम्मान बचाने के लिए मजबूरन आत्महत्या का रास्ता चुनता है।

न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के 2014 के आंकड़ें दिखाते हैं कि हमारे देश में हर रोज 70 लोग आत्महत्या करते हैं और उनमें से 33 लोग कृषि से जुड़े हुए हैं।

एन.सी.आर.बी. ने पहली बार किसानों की आत्महत्या के आकड़ों में खेत मजदूर और किसान की संख्या को अलग-अलग दिखाया है। इन आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में 12,360 आत्महत्या के मामले कृषि-सम्बन्धी थे। इनमें 6,710 खेत-मजदूर थे और बाकी 5650 किसान थे। इन 5,650 किसानों में 4,087 छोटे और निम्न किसान थे। इससे यह साफ़ नजर आता है कि छोटे और निम्न किसानों का तबका सबसे अधिक खतरे में है।
आकड़ों से यह भी पता चलता है कि आत्महत्या किये हुए किसानों में 20 प्रतिशत (1163) किसान ऐसे है, जो दिवालिया हो चुके थे या फिर बुरी तरह से कर्ज में डूबे थे। 965 किसानों ने दिवालिया होने पर आत्महत्या की, तो 952 ने फसल खराब होने के बाद आत्महत्या की।

जिन किसानों ने आत्महत्या की उनमें से दो-तिहाई की उम्र 30-60 वर्ष के बीच थी, और अधिकांश अपने परिवार के लिए एकमात्र रोजी रोटी कमाने वाले थे। पांच राज्य - महाराष्ट्र, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश, किसानों की आत्महत्या में आंकड़ों में इनका हिस्सा 86.6 प्रतिशत है। इनमें महाराष्ट्र सबसे ऊपर है (2538), और उसके बाद तेलंगाना (898), मध्य प्रदेश (826), छत्तीसगढ़ (443) और कर्नाटक (321) का नंबर आता है। 
तामिलनाडू में किसानों की आत्महत्या वैसे तो कम नजर आती है, लेकिन पिछले वर्ष 827 खेत-मजदूरों ने आत्महत्या की। इससे तामिलनाडू का नंबर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और तेलंगाना के बाद चैथे नंबर पर आता है।

किसानों की हालत इस कदर ,खराब हो गयी है कि उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। इसके कई कारण है - राज्य की एजेंसियों द्वारा किसानों से निर्धारित मूल्य पर कृषि उत्पाद की खरीदी बंद करना, कृषि क्षेत्र पर बहुराष्ट्रीय कृषि व्यापार कंपनियों का बढ़ता दबदबा, और विश्व बाज़ार में कृषि उत्पाद कीमतों और मांग-और-आपूति में तेज बदलाव की वजह से बढ़ता खतरा।

कृषि क्षेत्र में इस तरह की भयानक स्थिति से यह साफ़ हो गया है कि देश की अर्थव्यवस्था की दिशा को बदलने की जरूरत है। सरकार की प्राथमिकताओं को पूरी तरह से बदलने की जरूरत है। मौजूदा समय में कृषि सम्बन्धी नीतियों को तय करते समय सबसे बड़ी प्राथमिकता कृषि व्यापार में इजारादार कंपनियो के मुनाफों को सुनिश्चित करना होता है। इसको बदलकर नीतियाँ ऐसी बनानी होगी ताकि देश का पेट भरने वाले की जरूरतों को पूरा करना ही उसकी प्राथमिकता होगी। कर्ज वापसी के लिए किसानों को परेशान करने और आत्महत्या करने पर मजबूर करने के बजाय, सरकार को उनके कर्ज में डूबने और दिवालियापन की वजह को देखने और उन्हें हल करने की जरूरत है।

लेकिन यह सब मौजूदा राजनितिक प्रक्रिया के चलते संभव नहीं है, जहाँ लोग पूरी तरह से अधिकारहीन हैं और समाज का मुट्ठीभर कुलीन तबका राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को निर्धारित करता है। समय-समय पर किसानों ने एक सर्वव्यापी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, फसल बर्बादी पर व्यापक बीमा सुविधा, और सभी को सुख और सुरक्षा प्रदान करने वाली सरकार की मांग की है। लेकिन मौजूदा पार्टियों के वर्चस्व पर आधारित राजनीतिक प्रक्रिया, जहाँ कुलीन तबके की कुछ पार्टियाँ नीति निर्धारित करती है और अपना राज चलाती है, इन मांगों को सुनिश्चित करने के लायक नहीं है। हमारे किसानों की दुर्दशा इस बात की ओर इशारा करती है कि हमें एक लोक-केन्द्रित राजनीतिक प्रक्रिया स्थापित करने की जरूरत है, जहां बहुसंख्य लोग जिसमें किसान और खेत मजदूर शामिल हैं, अर्थव्यवस्था की दिशा को अपने हितों को पूरा करने के लिए बदल सकेंगे।

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