देश की अर्थनीति एक खतरनाक राह पर

Submitted by admin on Wed, 2014-10-01 11:11

Image removed.स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण दिखलाता है कि अर्थनीति को किस दिशा में धकेला जा रहा है। प्रधानमंत्री ने ‘देश में बनाओ’ का नारा दिया और विदेशी पूंजी को खुला न्योता दिया कि किसी भी वस्तु को वे हिन्दोस्तान में बना सकते हैं। उन्हें यहां सब सुख-सुविधाएं दी जायेंगी और श्रमिकों को दबाकर रखा जायेगा ताकि निवेशकों को अधिकतम मुनाफा मिले। यह नीति नयी नहीं है बल्कि देश में 1990-91 की मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों की ही निरंतरता है, जिन्हें दोनों, कांग्रेस व भाजपा नीत गठबंधनों ने लागू किया है। अब इन्हें और तेज़ी से आगे बढ़ाने के कदम लिये जा रहे हैं।

अर्थनीति का समाज के सांस्कृतिक जीवन से गहरा रिश्ता होता है। पिछली सदी के नब्बे के दशक से शुरू की गयी, उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये वैश्वीकरण की नीतियों के साथ, निजी लाभ के लिये हर नैतिक अनैतिक कार्य को बढ़ावा मिला। देश-समाज और मनुष्यता की कीमत पर अमीर बनने की होड़ मच गयी। अंधी प्रतियोगिता ने हर मनुष्य को एक-दूसरे का शत्रु बनने की दिशा में काम किया। घोर शत्रुता, असंवेदनशीलता, असभ्यता और तात्कालिकता की प्रवृत्तियों ने पूरे सामाजिक जीवन को विषाक्त कर दिया। मनुष्य इतना अकेला हो गया, जितना इतिहास के किसी दौर में नहीं था। अपने देश के शासक वर्ग ने, जो उपनिवेशवादी राज्य से सौदा करके सत्ता में आया था, ऐतिहासिक तौर पर मनुष्य को अपने सामन्ती बंधनों और रूढि़यों को तोड़ने से वंचित रखा। उसे अंधविश्वासों, अनुष्ठानों, कर्मकांडों और साम्प्रदायिकता के बंधनों में जकड़ रखा है। यह एक वैश्विक परिघटना बन गयी है। पूंजीवाद अपनी अर्थनीतियों की समाज की मूल समस्याओं को हल करने में असफलता पर परदा डालने के लिये लोगों को पुनः अतीत के सड़े-गले जीवन-दृष्टियों - जैसे कि जाति, धर्म, समुदाय, भाषा, राष्ट्रीयता के भेदभाव, आदि - की ओर ले जा रहा है। यह बेहद खतरनाक है।

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नई आर्थिक नीतियों की घोर सामाजिक असफलता की ज़मीन से प्रतिक्रियावादी राजनीति को नई ताकत मिली है। इसी का नतीजा है, मोदी सरकार। नई सरकार ने आते ही अर्थव्यवस्था के बचे हुये बंद दरवाजों को विदेशी पूंजी की लूट के लिये खोलने के साथ-साथ श्रम कानूनों में व्यापक एवं बुनियादी परिवर्तन करना शुरू कर दिया है। इन परिवर्तनों से देश में श्रमिक आबादी के लिये कानूनी संघर्ष के रास्ते और सीमित हो जायेंगे। इसके साथ ही, वर्तमान सरकार की स्पष्ट नीति है, बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और गरीब आबादी का विस्थापन तथा विकास के नाम पर पर्यावरण सुरक्षा के नियमों को समाप्त करना। सरकारी क्षेत्र का विनिवेशीकरण करना इसका लक्ष्य है ताकि अर्थव्यवस्था का पूरा क्षेत्र निजी पूंजीपतियों के हवाले करके, पूरे देश के भाग्य को बाज़ार के हवाले कर दिया जाये। इस दिशा में योजना आयोग को भी भंग कर दिया गया है।

शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह बाज़ार एवं बीमा कम्पनियों के हवाले करके, उसे बड़ी कमाई का ज़रिया बनाया जा रहा है। एक तरफ शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने का ढोंग किया जा रहा है, दूसरी तरफ देश की 80 प्रतिशत आबादी के लिये सिर्फ साक्षर बनाने की योजना है, ताकि सस्ता श्रम मिलता रहे।

आज स्थिति यह है कि देशी कारपोरेटों की कमाई का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों के कारोबार से है। देश में औद्योगिक उत्पादन में विदेशी कम्पनियों का हिस्सा आधे से अधिक हो गया है। विदेशी पूंजी मुनाफे़ के रूप में देश की कमाई का एक बड़ा हिस्सा ले जा रही है। मोदी सरकार की नीतियों से यह और बढ़ेगी। देशी काॅरपोरेटों की रुचि अपने देश में अधिक से अधिक छूट लेकर विदेशों में अपने कारोबार को और बढ़ाने की है। एक तरफ इन नीतियों से देश के भीतर का संकट और गहरा होगा, तो दूसरी तरफ मुट्ठी भर देशी-विदेशी काॅरपोरेट और मालामाल होंगे।

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वास्तव में मोदी सरकार कोई नयी आर्थिक नीति लेकर नहीं आयी है, बल्कि देश की बची हुयी आर्थिक संप्रभुता को बाज़ार के हवाले करके देश में अच्छे दिन लाने का झूठा स्वांग कर रही है। बीमा, बैंक और रक्षा क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष पूंजी निवेश पूरे देश की श्रमजीवी जनता एवं किसानों के लिये बहुत बुरे दिन लाने की कोशिश है। इन कार्यों से देश एक गम्भीर आर्थिक एवं राजनीतिक संकट में फंसने की दिशा में अग्रसर हो रहा है।

देश की श्रमजीवी जनता भी पुरानी व्यवस्था में बदलाव चाहती है, लेकिन सवाल है, कि उसकी दिशा क्या हो? जाहिर है, देश की बहुसंख्य आबादी मौजूदा राज की जगह एक ऐसा राज चाहती है जिसमें उत्पादन और वितरण के फैसलों को निजी मुनाफ़ों की जगह सभी की ज़रूरतों को पूरा करने के आधार पर लिया जाये। इसी दिशा में देश की समस्याओं का समाधान है। जबकि मोदी सरकार ठीक उल्टी दिशा में तबाही की ओर बढ़ रही है।

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इसलिये हमें मिलकर निम्न मुद्दों पर एक अखिल भारतीय संघर्ष शुरू करना है।

  • सरकारी नीतियों से पैदा हो रही सामाजिक असमानता और असुरक्षा के खिलाफ;
  • श्रम कानूनों को श्रमिकों के हित में सख़्ती से लागू करनेे एवं उसे पूरी श्रमिक जनता के लिये लागू करवाने के लिये;
  • किसानों के लिये वहन करने योग्य दामों पर खेती की सभी ज़रूरी वस्तुएं उपलब्ध कराने तथा लाभकारी समर्थन कीमतों पर फसलों की खरीद सुनिश्चित कराने के लिये सरकार को बाध्य करना;
  • सभी के हितों की रक्षा करने वाले एक नये भूमि अधिग्रहण कानून लाने तक, सभी कृषि भूमि अधिग्रहण पर रोक;
  • लोगों के नियंत्रण में एक व्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था स्थापित करने के लिये, जिसके ज़रिये सभी को अच्छी गुणवत्ता की और पर्याप्त मात्रा में जीवन की सभी ज़रूरी वस्तुएं उपलब्ध हों;
  • सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य को पूरी तरह सरकारी-सामाजिक नियंत्रण में लाना;
  • बैंक, बीमा और रक्षा क्षेत्र के निजीकरण का पूर्ण निषेध;
  • प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी में वृद्धि को रोकना और बढ़ाई गयी एफ.डी.आई. को रद्द कराना;
  • पर्यावरण की कीमत पर औद्योगिकीकरण पर रोक;
  • जीवन के लिये आवश्यक जिन्सों पर फ्यूचर ट्रेडिंग में रोक;
  • निजी पूंजी को किसी प्रकार की टैक्स में छूट पर रोक एवं उसकी कमाई पर आयकर में वृद्धि;
  • विकास के पी.पी.पी. माॅडल पर पूर्ण रोक;
  • देश के बाहर जाने वाली पूंजी पर नियंत्रण, ताकि देश की आवश्यकताओं के लिये उसका उपयोग हो सके;
  • देशी काले धन की व्यवस्था को खत्म करने के लिये निजी सम्पत्ति की पूरी जांच एवं उसे खत्म करने के लिये कठोर कदम;
  • इस क्षेत्र में व पूरे विश्व में साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा दखलंदाज़ी का कड़ा विरोध और सभी पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीभाव को बढ़ावा, सैन्यकरण जैसे सभी अनुत्पादक खर्चाें में कटौती; तथा
  • सभी मूल अधिकारों के लिये संवैधानिक गारंटियां
  • सरकार को लोगोें की खुशहाली और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने के लिये बाध्य करना।
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