मंहगाई खत्म करने के लिये लोगों के हाथ में नियंत्रण जरूरी है

Submitted by admin on Fri, 2010-03-19 14:28

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प्रजा की तरफ इस तरह पूरी लापरवाही करने वाले सत्ताधारियों की हम सभी को कड़ी से कड़ी निन्दा करनी चाहिए।

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प्रजा की तरफ इस तरह पूरी लापरवाही करने वाले सत्ताधारियों की हम सभी को कड़ी से कड़ी निन्दा करनी चाहिए।

लोक राज संगठन का बयान, जनवरी 2010

भाईयों और बहनों,

 

केवल तूर दाल ही नहीं, बल्कि अनाज, सब्जियां, खाने का तेल, आदि सभी की कींमतें आसमान छू रही हैं। कई चीज़ों की कामतें तो पिछले एक साल में ही दुगुनी हो गयी हैं। महनतकशों की कमाई का आधे से ज्यादा पेट भरने के लिए खर्च होता है, इसीलिए महंगाई से मेहनतकशों की हालत बहुत गंभीर हो गयी है।

 

लोगों की इस गंभीर परिस्थिति के लिये, केन्द्र तथा राज्य सरकारें, ''कम बारिश'' तथा ''अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ऊंचे दाम'', इन्हीं को महंगाई के लिए ज़िम्मेदार बताने में व्यस्त हैं। परन्तु वे इस तरह की नीतियाँ लागू कर रहें हैं जिनसे महंगाई कम होने की जगह और बढ़ेगी। प्रजा की तरफ इस तरह पूरी लापरवाही करने वाले सत्ताधारियों की हम सभी को कड़ी से कड़ी निन्दा करनी चाहिए।

 

अपने देश में अंग्रेज़ों के आने के पहले से ही जो राजधर्म की संकल्पना मान्यताप्राप्त थी, उसके अनुसार, प्रजा की सुख और समृध्दि, यहीं राजा की सब से प्रमुख ज़िम्मेदारी है। प्राकृतिक तथा दूसरे संकटों से जनता का रक्षण, राजा की प्राथमिक ज़िम्मेदारियों में से एक थी। जो शासक इन जिम्मेदारियों को निभा नहीं सकता था, उसे सत्ता पर रहने का हक नहीं था। इसीलिए हमें, एक हो कर, माँग करना चाहिए कि ''महंगाई के खिलाफ़ जंग छेड़ कर इसे तुरंत कम करना जिसके लिये मुमकिन नहीं है, उसे सत्ता छोड़ देनी चाहिए!''

 

विधान सभा में सड़े हुए अनाज के सैम्पल दिखाने का नाटक करने की आवश्यकता नहीं है। राशन दुकानों में घटिया चीज़वस्तुएं मिलती हैं, वह भी बहुत कम मात्रा में, और उसके लिए भी घंटों लाईन लगानी पड़ती है, यह सब आम जनता अच्छे से जानती है। ऐसे नाटक विधान सभा में चलते रहेंगे, पर इनसे महंगाई की समस्या हल नही होगी। इसे सुलझाने का एक ही उपाय है। जनता के हाथों में राशन दुकानों का नियंत्रण देना। इसीलिए हमें माँग करनी चाहिए कि ''जगह-जगह पर जनता द्वारा राशन समितियों का चयन किया जाये! फिर उन समितियों के हाथों में स्थानीय राशन दुकानों का पूरा नियंत्रण दिया जाये तथा खराब गुणवत्ता तथा अपर्याप्त मात्रा की सप्लाई के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों, ठेकेदारों और मंत्री को सजा देने का पूरा अधिकार भी इन समितियों को दिया जाये!''

 

1998 में केन्द्र सरकार ने जबरदस्ती से ''लक्षाधारित राशन व्यवस्था'' लागू की। उस के ज़रिये करोड़ों मेहनतकशों को राशन दुकानों में मिलनेवाली सस्ती वस्तुओं से वंचित किया गया था। इस नयी व्यवस्था के अंतर्गत जो ''गरीबी रेखा'' तय की गयी, उसके मुताबिक धारावी जैसे इलाके में भी गरीब परिवारों की संख्या 100 से भी कम हैं! इस नयी नीति की वजह से मेहनतकशों में फूट डाली गयी। इसीलिए हमें माँग करनी चाहिए कि ''सभी जनता को उचित दरों पर, पर्याप्त मात्रा में अनाज, केरोसीन, खाने का तेल, शक्कर, आवश्यक दवाइयां, स्टेशनरी, कपड़ा, आदि, मिलना चाहिए!''

मगर ''क्या करें? सरकार के पास पैसा नहीं है।'' - इस तरह का रोना नेतागण तुरंत शुरू करेंगे। इसीलिए हमें यह भी माँग करनी चाहिए कि ''इसके लिए आवश्यक धन, अमीरों को दी जा रही लाखों-करोड़ों की रियायत में कटौति करके इकट्ठा किया जाये!''

 

सरकार ने तूर दाल के लिए किसानों को मात्र 27 रु. प्रति किलो देने का वादा किया है, जबकि उसी दाल के लिये ग्राहकों को 100 रुपयों से भी ज्यादा देना पड़ता है। सभी अनाज, सब्जियों, फल, आदि, कृषि उत्पादनों की भी यही हालत है। स्पष्ट है कि इसकी जिम्मेदारी बड़े-बड़े व्यापारी तथा पूंजीपति कम्पनियां की है। जब खेती से ज्यादा उत्पादन होता है, तब वे सस्ते दाम में खरीद कर जमाखोरी करते हैं; और फिर उत्पादन कम होता है तो ऊंचे दाम पर बेच कर मुनाफ़ा बनाते हैं। मतलब, भूखी जनता को लूट कर मोटा होना, यही पूंजीपतियों का धंधा है। इसीलिए हम ने माँग करनी चाहिए कि ''कृषि उत्पादनों के थोक व्यापार का पर नियंत्रण रखने की जिम्मेदारी सरकार अपने हाथ में ले। सरकार को किसानों को जायज दाम देना चाहिए तथा उपभोक्तओं को उचित दर पर चीजवस्तुएं उपलब्ध करनी चाहिए। निजी मुनाफ़ेखोरों पर इनके व्यापार में पाबंदी लगायी जाय!''

बेशुमार धन का इस्तेमाल करके निजी कप्नियां अनाज के मामले में खरीदी - बिक्री का सट्टा खेलती हैं और मंदी तथा तेजी, दोनों में मुनाफ़ा कमाती हैं। इसीलिए हमें यह माँग भी करनी चाहिए कि ''अत्यावश्यक खाने की चीजवस्तुओं की जमाखोरी तथा वायदे बाजार पर सरकार पूरी तरह व तुरंत बंदी लगाए!''

 

सभी आवश्यक चीजवस्तुओं की आवश्यक मात्रा स्टॉक में रखना और जरूरत के अनुसार उसे बाजार में लाने की ज़िम्मेदारी, केन्द्र सरकार की सब से महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है। आयात निर्यात की नीतियों का भी सब से प्राथमिक उद्देश्य यही होना चाहिए। मगर खुद के बच्चों को भूखा रख कर, घर का आनाज बाहर बेच कर ऐश करनेवाले क्रूरकर्मा बाप जैसे ही सरकार का भी बर्ताव है। शक्कर का उदाहरण लीजिए। दो साल पहले शक्कर का बहुत ज्यादा उत्पादन हुआ। किसानों को भी कम दर में गन्ना बेचना पड़ा था। मगर सरकार ने शक्कर का स्टॉक बढ़ाने के बजाय, अंतरराष्ट्रीय बाजार में शक्कर की ज्यादा कीमत होने की वजह से शक्कर निर्यात करने की इज़ाज़त निजी कम्पनियों को दी थी। अब यही सरकार कह रही है कि इस साल शक्कर का उत्पादन कम होने की वजह से स्थानीय बाज़ार में कीमत बढ़ गयी है। इसीलिए हमें माँग करनी चाहिए कि ''आयात निर्यात नीतियां तय करते वक्त, सब से पहला उद्देश्य, आम जनता की आवश्यकताओं की आपूर्ति होना चाहिए।''

 

इन सब माँगों पर जब तक अमल नहीं किया जाता, तब तक महंगाई खत्म होना नामुमकिन है। ऊपर दी गयी सभी माँगें पूरी करना मुश्किल नहीं है। इसीलिए ''हमें जनता के प्रति प्यार है'', ऐसे कहनेवाले ग्राम पंचायत से लोक सभा तक के सभी नेताओं व् जन प्रतिनिधियों पर हमें दबाव डालना चाहिए कि वे भी यहीं माँगें उठाए। रहने की जगह पर, कारखानों, मोहल्लों, दफ्तरों, काम करने की सभी जगहों पर हमें लोक राज समितियों का गठन करना होगा। ऊपर बताई माँगों के साथ-साथ, मेहनतकश जनता की खुशहाली के लिए आवश्यक अन्य माँगों की पूर्ती के लिए भी इन समितियों को आम जनता को संगठित करना होगा। राशन व्यवस्था जैसी सभी समितियों का कारोबार इन जन समितियों को धीरे धीरे अपने हाथों में लेना होगा। आम जनता के हाथों में संपूर्ण सत्ता, अर्थात लोक राज की स्थापन करने के लिए इसी तरह से कदम उठाना आवश्यक है।

 

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